Srishti Khanda Extracted Page 759
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-759
Sanskrit Original
ट्रोफ्कमहापुराणा हाहेति विधिं कृत्वा चोपविश्य धरातले । प्रचिंतामगमद्वीरस्तमुवाच पुनस्तथा ॥४७॥ देववागुवाच पूर्वस्यां दिशि देवेश तीर्थ चास्ति गुहोदरे । श्रोभगवानुवाच तच्छुत्वा नरशार्दूलो गत्वा कुंडं ददर्श सः ॥४८॥ प्रदक्षिणं जलावर्त शुभ्रं पापहरं शुभम् । तज्ज्लस्पर्शमात्रेण कुठारः शुद्धतां गत: ॥४९॥ ततो रामोभिषेकं तु कृतवाम्प्रमुदान्वितः । शुद्धात्मनस्त्वपापस्य बुद्धिर्जाता प्रपाविनी ॥५०॥ स राम: सुचिरं स्थित्वा तीर्थराजं प्रसाद्यतम् । ततस्ततोऽ चलात्प्राप्य पुरं वेगसमन्वितः ॥५१॥ ख्यातं कृत्वा ततश्चोर्व्यां गतोऽसौ लवणार्णवम्। अयं तीर्थवरः साक्षात् पितामहकृतो भुवि ॥५२॥ सुखद: सर्वतः शुद्धो मुक्तिमार्गप्रदः किल । एवंकामप्रभावं च विद्धिदुर्वारदुःसहम् ॥५३॥ कामाज्जातं वृषं पापं पुण्यं पुण्यप्रयोगतः । सजातश्चैव लौहित्यो विरिंचेश्चैव चौरसः॥५४॥ शंतनो: क्षेत्र संजातस्त्वमोघा गर्भसंभवः । विरिञ्जिना जितः कामः शांतनोरप्यमत्सरात् ॥५५॥ तस्याः पतिब्रतात्वाच्च तीर्थाततीर्थवरोहि सः । एवं यस्तु पठेन्नित्यं पुण्याख्यानमिदं शिवम् ॥५६॥ शृणुयाद्वा मुदा पृथ्व्यां मुक्तिमार्गं स गच्छति । इतिश्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे पंचाख्याने लौहित्योत्पत्तिर्नाम पचपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥५५॥ शा नर (9) हाय-हाय करके परशुरामजी पृथिवी पर बैठकर अत्यधिक चिन्ता किये, उस समय उनको पुनः आकाशवाणी हुयी।।४७। आकाशवाणी ने कहा-- हे देवेश ! पूर्व दिशा में गुफा के भीतर वह तीर्थ है श्रीभगवान् ने कहा-- उसको सुनकर नरश्रेष्ठ वे वहाँ जाकर कुण्ड को देखे । उसका शुभ तथा पाप विनष्ट करने वाला जल दक्षिणावर्त था उस जल का स्पर्श होते ही कुठार निर्मल हो गया ॥४९॥ उसके बाद परशुरामजी ने प्रसन्नता पूर्वक उसमें स्नान किया। शुद्ध परशुरामजी की बुद्धि पवित्र हो गयी ॥५०॥। परशुरामजी दीर्घकाल तक वहाँ रहे उस तीर्थराज को प्रसन्न किए । उसके बाद वे वहाँ से वेगपूर्वक नगर में आकर उस तीर्थ को लोक विख्यात बनाये और क्षार समुद्र में गये। इस तीर्थ को साक्षात् ब्रह्माजी ने पृथिवी पर बनाया है ॥५२॥ वह तीर्थ सुखद हर प्रकार से शुद्ध तथा मोक्षमार्ग को प्रदान करने वाला है । इसतरह तुम काम के प्रभाव को दुर्वार और दुःसह जानो ॥५३॥ काम से ही वृष, पाप तथा उसके पुण्य प्रयोग से पुण्य उत्पन्न हुआ । वह लौहित्य तीर्थ ब्रह्माजी का औरस पुत्र भी काम से ही उतपन्न हुआ॥५४॥। शन्तनु ऋषि की पत्नी अमोघा के गर्भ से वह उत्पन्न हुआ । शन्तनु के प्रति मात्सर्य नहीं होने के कारण ही ब्रह्माजी ने काम को जीत लिया ॥५५॥ अमोघा के पवित्र पातिव्रत्य के कारण वह श्रेष्ठ तीर्थ हुआ । इसतरह से इस कल्याणकारी आख्यान को जो सदैव ही पढता है अथवा प्रसन्नतापूर्वक सुनता है वह मोक्ष को प्राप्त करता है॥५६॥ इस तरह श्रीपद़्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के लौहित्योत्पत्ति नामक पचपनवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ५५।। — ie
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