Srishti Khanda Extracted Page 758

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-758

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Sanskrit Original

पत्युराज्ञां समादाय मुक्तो गर्भो युगंधरे । पयस्तेजोमयं शुद्धं सर्वधर्मप्रतिष्ठितम्॥३ ३॥ तन्मध्ये पुरुषः शुद्धः किरीटी नीलवाससा । रत्नदाम्ना च विद्धांगो दुः प्रेक्ष्यो ज्योतिषां गण:॥३४॥ ततो देवगणाः स्वर्गात् पुष्पवर्षमवाकिरन् । प्रसूतः सर्वतीर्थेषु तीर्थराज इति स्मृतः ॥३५॥ ततो राम इति ख्यातः प्रजातोहं भृगोः कुले । क्षत्रियान्पितृहंतृंस्तु ससैन्यबलवाहनान् ॥३६॥ हत्वा युद्धगतान् भीतान् पंकैः सर्वै र्युतोह्याहम् । ब्रह्महत्यासमं घोरं मनद्नेहे समुपस्थितम् ॥३७॥ पंकयुक्तं कुठारं मे क्षालितं नैव शुद्धयति । ततःखे चाभवद्वाणी राममद्दचनं कुरु ॥३८॥ देववागुवाच यत्र तीर्थे कुठारं ते निर्मलं च भवेदिह । तत्र ते सर्वपापानां जातानां च क्षयो भवेत् ॥३९॥ जनानां तत्र सर्वेषां हितार्थ तिष्ठ मानद । चपलं गच्छ तीर्थानि सर्वाणि सुमहांति च ॥४०॥ तेषां मध्ये महातीर्थे पर्शुः शुद्धोभवेद्यदि । तं च जानीहि तीर्थेषु मुक्तिदं परिकीर्तितम् ॥४९॥ श्रीभगवानुवाच तच्छुत्वा जामदग्न्यस्तु तीर्थानि प्रययौ तदा । गङ्गां सरस्वतीं शुभ्रां कावेरीं सरयूं तथा॥४२॥ गोदावरीं च यमुनां कद्रूं च वसुदां तथा । अन्यांच पुण्यदां रम्यां गौरीं पूर्वास्थितां शुभाम्॥४३॥ गच्छतस्तस्य धीरस्य सदागतिसमस्य च। क्षालितः सर्वतीर्थेषु न पुनर्निर्मलो भवत् ॥४४॥ ततोगिरिगुहां दुर्गा महारण्यं च पर्वतम् । गिरिकूटं च दुर्लभ्यं ययौ तीर्थमसौ हरिः ॥४५॥ नच निर्मलतामेति कुठारस्तस्य तेन च। विषादमगमत्तत्र रामः परपुरंजयः ॥४६॥ प्रभो! में क्या करू ? मेरा प्राण निकलना चाहता है । हे महाभाग ! आप बतलायें कि इस गर्भ का मैं परित्याग कहाँ करूँ 2॥३२॥ अपने पति की आज्ञा लेकर उसने युगंधर में गर्भ का परित्याग किया । जिसमें सभी धर्म प्रतिष्ठित था वह तेज जलमय हो गया ॥३३॥ उसके बीच से किरीट और नीला वस्रधारी पुरुष प्रकट हुआ । उसके सारे अङ्ग रत्नमयी डोरी से वद्ध था । उसकी ज्योतियाँ इतनी थी कि उसको देखना कठिन था ॥३४।। उसके बाद उसके ऊपर सभी देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की, वह सभी तीर्थो में उत्पन्न हो गया और तीर्थराज के नाम से विख्यात हुआ॥३५॥ उस समय मैं महर्षि भृगु के वंश में मैं मेरे पिता को मारने वाले क्षत्रियो को सेना और वाहन के साथ मारने वाला परशुराम के नाम से उवतीर्ण हुआ था ॥३६॥ भयभीत हुए उन सबों को मारकर मैं पाप से संलिप्त हो गया । मेरे घर में ब्रह्महत्या के समान पाप उपस्थित हो गया । पाप से सना हुआ मेरा कुठार (फरसा) धोने से भी साफ नहीं होता था । उसी समय आकाशवाणी हुयी कि राम मेरी बात मानो ॥३८॥ देववाणी ने कहा-- इस संसार में जिस स्थान पर तुम्हारा कुठार निर्मल हो जाय वहीं पर तुम्हारे समस्त पापों का नाश होगा ॥३९॥ हे शत्रुओं के मान का दमन करने वाले तथा सभी लोगों का कल्याण करने के लिए तुम शीघ्रता से समस्त बड़े-बड़े तीर्था में जाओ ॥४०॥ उन सबों में से जिस महान् तीर्थ में तुम्हारा फर्सा शुद्ध हो जाय उसी तीर्थ को तुम सभी तीर्थो में मुक्ति प्रदान करने वाला समझो ॥४१॥ श्रीभगवान् ने कहा-- यह सुनकर परशुराम जी सभी तीर्थो में गये, गङ्गा, सरस्वती, स्वच्छ कावेरी, सरयू ॥४२॥ गोदावरी, यमुना, कद्रू तथा वसुदा तीर्थो में वे गये । दूसरे भी तीरों में जहाँ पहले गौरी थी वहाँ गये ॥४३॥ वायु के वेग से सभी तीर्थो में जाकर बार-बार धोने से उनका कुठार स्वच्छ नहीं हुआ ॥४४॥ उसके बाद पर्वतों की दुर्गम गुफाओं में बड़े-बड़े वनों में एवं, पर्वत पर दुलंघ्य पर्वत कूटों पर वे तीर्थो में गये॥४५॥ फिर भी उनका कुठार निर्मल नहीं हुआ । उसके कारण शत्रुजयी परशुरामजी को विषाद हो गया ॥४६॥ उसके बाद

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