Srishti Khanda Extracted Page 757

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-757

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Sanskrit Original

शंतनुश्वेति विख्यात: पत्नी तस्य पतित्रता । अमोधेति समाख्याता रूपयौवनशालिनी ॥२०॥ अस्याश्च पतिमन्वेष्ठु यातो ब्रह्मा चतद्गृहम् । तस्मिन्काले मुनिश्रेष्ठः पुष्पाद्यर्थ वनं गत: ॥२१॥ सा तं दृष्ट्वा सुरश्रेष्ठमर्थपाद्यादिक ददौ । दूरेभिवादनं कृत्वा सा गृहं प्रविवेश ह ॥२२॥ तां च दृष्ट्वा नवद्यांगीं धाता कामवशं गत: । स्रष्टात्मानं समाधायाचिंतयत्तां पुरोगताम् ॥२३॥ बीजं पपातखट्वायां ब्रह्मणः परमात्मनः । ततो ब्रह्मागतस्त्रस्तस्त्वरया परिपीडितः ॥२४॥ अथायातो मुनिर्गेहं शुक्रं पीठे ददर्श ह । तामपृच्छद्दरारोहां कश्चाप्यत्रागतः पुमान् ॥२५॥ तमुवाच ततोऽमोधा ब्रह्माहयत्रागतः पते । त्वामेवान्वेषितुं नाथ मयादत्तोऽत्र पीठकः ॥२६॥ शुक्रस्य कारणं चात्र तपसाज्ञातुमर्हसि । ततोध्यानात्परिज्ञातं तेनैव च द्विजन्मना॥२७॥ शन्तनुरुवाच ब्र्मरेतः परं साध्वी पालयस्व ममाज्ञया । उत्पद्यते सुतस्ते तु सर्वलोकैकपावनः ॥२८॥ आवयोः सर्वकल्याणं फलिष्यति मनोगतम् । श्रीभगवानुवाच ततः पतिव्रता तस्य आज्ञामागृह्य संभवात् ॥२९॥ पपौ रेतो महाभागा ब्रह्मणः परमात्मनः । आवर्त इव संजज्ञे रौद्रगर्भ इति स्फुरन् ॥३०॥ प्रसोढुं नैव शक्ता सा शंतनु चाब्रवीत्ततः । अमोघोवाच गर्भ धारयितुं नाथ न शक्कोम्यधुना प्रभो ॥३ १॥ किंकरिष्यामि धर्मज्ञ प्राणो मे संचलत्यपि । आज्ञापय महाभाग गर्भ त्यक्षामि यत्र च ॥३२॥ समान कान्ति वाले एक मुनि थे । उनका नाम शन्तनु था । उनकी पत्नी पतिव्रता थीं उसका नाम अमोघा था । वह रूप तथा युवावस्था से सुशोभित थी ॥२०॥ उसके पति को खोजने के लिए ब्रह्माजी उसके घर गये । उस समय मुनि फूल आदि लाने के लिए वन में गये थे ॥२१॥ उन देव श्रेष्ठ ब्रह्माजी को देखकर अमोधा ने उन्हें पाद्य, अर्घ्य इत्यादि प्रदान किया । उनको दूर से प्रणाम करके वह अपने घर में चली गयी ॥२२॥ उस निरवद्य सुन्दरी को देखकर ब्रह्माजी कामार्त हो गये । ब्रह्माजी ने अपने को समाधिस्थ करके उसकी चिन्ता की ॥२३॥ उसके कारण ब्रह्माजी का वीर्यपात् उस खाट पर ही हो गया । उसके बाद काम पीडित ब्रह्माजी शीघ्र ही वहाँ से चले गये ॥२४॥ इसके बाद जब मुनि घर पर आये तो उन्होंने खाट पर वीर्य को देखा । उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा कौन सा पुरुष यहाँ आया था ॥२५॥ उसके बाद अमोघा ने कहा यहाँ पर ब्रह्माजी आये थे हे नाथ ! वे आपको ही खोज रहे ये, मैंने उन्हें बैठने के लए यह पीठ दिया ॥२६॥ इस वीर्य का कारण क्या है ? इस बात को तो आप अपनी तपस्या के बल से जान सकते हैं । उसके बाद ध्यान करके मुनि ने सारी बात जान ली । शन्तनु मुनि ने कहा-- हे साध्वि! यह ब्रह्माजी का रेतस है, मेरी आज्ञा है कि तुम इसका पालन करो । ऐसा करने से तुम्हारा पुत्र सम्पूर्ण लोकों को पवित्र बनाने वाला होगा ॥२८॥ हमदोनों के मनोगत सम्पूर्ण मनोरथ पूरे हो जायेंगे । श्रीभगवान् ने कहा-- उसके बाद उस पतिव्रता ने अपने पति की आज्ञा प्राप्त करके ॥२९॥ ब्रह्माजी के उस रेतस को पी लिया । उसके कारण वह भयंकर गर्भ आवर्त के समान चल रहा था ॥३०॥ इसतरह से उसने शन्तनु महर्षि से कहीं कि, वह उसे बर्दास्त नहीं कर पा रही है । अमोधा ने कहा-- हे प्रभो ! इस समय में गर्भ को धारण करने में समर्थ नहीं हूँ ॥३१॥ हे

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