Srishti Khanda Extracted Page 756

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-756

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Sanskrit Original

नार्युवाच अनन्विता गिरस्तात वक्तु त्वं नाहसि प्रभो । श्रीभगवानुवाच अथासौ भागवान्प्राह प्रचुरं चास्ति मे वसु ॥९॥ तव दास्यामि कल्याणि प्रस्फोटय कपाटिकाम् । विप्रमाह पुनः सा च त्वं वै मे धर्मतः पिता॥१०॥ मा गच्छ पुत्रिकां मां च परयोषां च धार्मिक । मनसा स समालोच्य सुषिरेण पथा गृहान् ॥११॥ बाहुनोद्धाट्यते नैव गंतुं चैव समुद्यतः । गच्छतश्चार्द्धमरर उत्तमांगं सुसंकटे ॥१२॥ प्रविष्टं न पुनश्चेति पंचत्वमगमत्तदा। उषः काले समायाता रक्षिणो ये च किंकिराः॥९३॥ अद्भुतं तं शवं दृष्ट्वा तामूचुस्ते च विस्मिताः । रक्षिण ऊचुः कथं च निधनं त्वस्य संभूतं ब्रूहि सुन्दरि ॥९४॥ श्रीभगवानुवाच कथयित्वा तु तदृत्तमभीष्टं देशमागता। एवं कामस्य महिमा दुर्निवारो जनेषु च ॥१५॥ सर्वेषामपि जंतूनां सुरासुरनृणां भवेत् । दृष्ट्वाऽमोघां वरारोहां सर्वलोकपितामहः ॥९६॥ च्युतबीजोऽ भवत्तत्र लौहित्यसंभवःस्मृतः । पुनाति सकलान् लोकान्सर्वार्थथयोहि सः ॥९७॥ यमाश्रित्य नरो याति ब्रह्मलोकमनामयम् । द्विज उवाच कथं च ब्रह्मणो मोहो हामोघा का वरांगना ॥१८॥ उद्धवंतीर्थराजस्य श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः । श्रीभगवानुवाच मुनिर्देवैः समाराध्यः पद्ययोनिसमप्रभः ॥१९॥ कहा-- हे प्रभो ! आप मुझसे अनुचित बातें न करें । श्रीभगवान् ने कहा-- उसके बाद उन परमंहस ने कहा मेरे पास प्रचुर सम्पत्ति है हे कल्याणि ! उसे मैं तुम्हे दे दूंगा, किवाड़ खोलो । उसने फिर कहा आप मेरे घर्म के पिता हैं॥९-१०॥ हे धार्मिक ! मैं आप की पुत्री तथा दूसरे की पत्नी हूँ, मेरे साथ संगम न करें मन में विचार करके उसने छिद्र के मार्ग से घर में प्रवेश करना चाहा किन्तु मार्ग के छोटा होने से प्रवेश करते हुए उसका शिर उस किवाड़ में फंस गया ॥११-१२।। वह उसी में फंसकर मर गया प्रात:काल की बेला में रक्षक और नौकर आये ॥१३॥ उस अद्भुत शव को देखकर वे सब आश्चर्यित हो गये । रक्षकों ने पूछा-- हे सुन्दरि इसकी मृत्यु कैसे हुयी ?॥१४॥ श्रीभगवान् ने कहा-- वह सुन्दरी उस वृत्त को बतलाकर अपने अभिप्रेत स्थान पर चली गयी । इस तरह लोगों के लिए काम की महिमा दुर्निवार है ॥१५॥ काम सभी जीवों देवताओं और असुरों के लिए दुर्निवार है । अमोघा नाम की नारी को देखकर सम्पूर्ण लोकों के पितामह का भी वीर्य स्खलित हो गया और उसी से लौहित्य का जन्म हुआ । लौहित्य सर्व तीर्थमय है, और सम्पूर्ण जीवों को पवित्र बनाता है ॥१६-१७॥ उसी का आश्रयण करके मनुष्य, निर्दोष, ब्रह्मलोक में जाता है । द्विज ने कहा-- ब्रह्माजी को कैसे मोह हो गया ? सुन्दरी अमोघा कौन थी ?2॥१८॥ मैं तीर्थराज की उत्पत्ति को सुनना चाहता हूँ । श्रीभगवान् ने कहा-- देवताओं के द्वारा आराध्य तथा ब्रह्माजी के

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