Srishti Khanda Extracted Page 755
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-755
Sanskrit Original
मेषांडं तवशिश्नं च भविष्यति च मद्दरात् । इत्युक्त्वा सा जगन्माता तत्रैवांतरधीयत ॥५०॥ शक्रो देववरैः पूज्योह्यद्यापि दिवि वर्तते । इं्रस्यैतादृशी कामादवस्था द्विजसत्तम् ॥५१॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे अहल्याहरणं नाम चतुष्पंचाशत्तमोऽध्यायः ॥५४॥ Be पचपनवा अध्याय श्रीभगवानुवाच अपरं च प्रवक्ष्यामि कामेनाधिष्ठितस्य च । पुराभागीरथी तीरो द्विजः परमहंसकः ॥१॥ उपदेष्टा सहस्राणां द्विजानां शांतिदःपरः । एकदंडधरः साक्षात्कूर्मवद्धरणीस्थित: ॥२॥ एकाकिनः सतस्तस्य देवागारे विनिष्कृते । पत्युर्गृहात्परं गेहं गंतुं सायं समुद्यता ॥३॥ अकस्माद्युवती नारी मिलिता रूपधारिणी। दृष्ट्वा तां भगवान् विप्रो मन्मथस्य भयार्दितः ॥४॥ _ अगारजटठरे कृत्वा सचैनां प्राक्षिपत् क्षपाम् । अर्गलं सादृढं कृत्वा देवागारे सुशोभने ॥५॥ कदाचिदपि तं द्वारादागंतुं न ददाति ह । एवंभूतः समाधिस्थः क्षपां क्षिप्त्वा विलप्य सः॥६॥ चितयंस्तां वरारोहां द्वारि किं वा कृत मम । एवं संचित्यतामाह द्वारं देहीह नः प्रिये ॥७॥ पतिश्च वशगः कांते दयितस्ते भविष्यति। ततस्तं प्राह सा विप्रं वृद्धं कामप्रलालसम् ॥८॥ और लिङ्ग होंगे । इसतरह से वरदान देकर जगन्माता देवी अन्तर्धान हो गयीं ॥५०॥ इन्द्र भी श्रेष्ठ देवताओं से पूजित होकर आज भी स्वर्गलोक में विद्यमान हैं । हे द्विजश्रेष्ठ ! काम के कारण इन्द्र की ऐसी अवस्था हो गयी ॥५१॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के अहल्या हरण नामक चौवनवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।। ५४।। —— re काम का दुर्जयत्व वर्णन, परमहंस चरित्र तथा लौहित्य की उत्पत्ति का वर्णन श्रीभगवान् ने कहा-- अब में काम विषयक दूसरे प्रसङ्ग को सुनाता हूँ । प्राचीनकाल में भागीरथी के तट पर एक परमहंस ब्राह्मण रहता था ॥१॥ वह हजारों ब्राह्मणों को अपने उपदेश के द्वारा शान्ति प्रदान किया था । वह एक दण्ड धारण करने वाला तथा पृथिवी पर कच्छप के समान अपनी इन्द्रियों को अन्तर्मुखी रखता था ॥२॥ उस अकेले रहने वाले परमंहस के सुन्दर देवगृह में अपने पति के'घर से सायंकाल दूसरे के घर जाती हुयी एक युवतीनारी रात को टिक गयी ॥३॥ अकस्मात् सुन्दरी तथा युवती नारी को देखकर वे परमहंस कामार्त हो गये ॥४॥ सुन्दरी अपने घर के भीतर अच्छी तरह से किवाड़ बन्द करके तथा देवागार में सुदृढ अर्गला (कीली) बन्द करके रात बितायी ॥५॥ उस द्वार से वह किसी को भी आने नहीं देती थी । इस तरह विलाप करके परमहंस समाधिस्थ होकर किसी तरह रात बिताये ॥६॥ वे रात भर उस सुन्दरी के विषय में तथा उस द्वार के विषय में सोचते रहे । इसतरह से विचार करके उन्होंने उससे कहा हे प्रिये ! मुझे घर के भीतर आने दो ॥७॥ हे कान्ते ! तुम्हारा पति वशवर्ती और तुम्हारा प्रिय होगा । उसके बाद उस रमणी ने उस कामी तथा वृद्ध ब्राह्मण से कहा ॥८॥ नारी ने
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