Srishti Khanda Extracted Page 754
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-754
Sanskrit Original
दृष्ट्वा त्वां दुःखितां शुष्कां निर्देहां पथि संस्थिताम् । गदिष्यति च वै रामोकौशिकस्याग्रतो हसन् ॥३७॥ किमियं शुष्करूपा च प्रतिमास्थिमयीशुभा। न दृष्टं मे पुरा ब्रह्मन् रूपं लोकविपर्ययम् ॥३८॥ ततो रामं महाभागं विष्णुं मानुषविग्रहम् । यद्वृत्तमासीत्पूर्वं तत् कौशिकः कथयिष्यति ॥३९॥ कौशिकस्यवचः श्रुत्वा रामो वक्ष्यति धर्मवित्। अस्या दोषो न चैवास्ति दोषोऽयं पाकशासने ॥४०॥ एवमुक्ते तु रामेण त्यक्त्वा रूपं जुगुप्सितम् । दिव्यं रूपं समास्थाय महुहं चागमिष्यसि ॥४९॥ शप्त्वा तु गौतमस्तां हि तपस्तप्तुं गतो वनम् । ततोत्यन्तं शुष्करूपा तथैव पथिसंस्थिता ॥४ २॥ रामस्य वचनादेव गौतमं पुनरागता । गौतमोपि तया सार्द्धमद्यैवं दिवि तिष्ठति ॥४३॥ इंद्रोऽपि त्रपया युक्तः स्थितश्चांतर्जलेचिरम् । स्थित्वा चांतर्जले देवीमस्तौषीदिंद्राक्षिसं्ञिताम् ॥४४॥ सुप्रसन्ना ततो देवी स्तोत्रेण परितोषिता । गत्वोवाच ततः सा च वरोऽस्मत्तो विगृह्यताम्॥४५॥ ततो देवीमुवाचेदं शक्रः परपुरंजयः । शक्र उवाच त्वत्प्रसादाच्च मे देवि वैरूप्यं मुनिशापजम् ॥४६॥ संत्यज्य देवराज्यं च लब्ध्वाहं तु पुरा यथा । श्रीभगवानुवाच तमुवाच ततो देवी पापं तं मुनिशापजम् ॥४७॥ हंतुं ब्रह्मादयो देवाश्शक्ता नाहं सुरेश्वर । किंतु बुद्धिं सृजाम्यद्य येन लोकैर्न लक्ष्यते ॥४८॥ योनिमध्यगतंदृष्टिसहसत्रं ते भविष्यति । सहस्राक्ष इति ख्यातस्सुरराज्यं करिष्यसि ॥४९॥ महर्षि कौशिक के सामने तुमको दुखी, शुष्क, देह रहित और मार्ग में पड़ी हुयी देखकर हँसते हुए कहेंगे ॥३७॥ यह सुखा हुआ, अस्थि रूपी शव कैसा है ? हे ब्रह्मन् ऐसा रूप का परिवर्तन मैंने कभी नहीं देखा है ॥३८॥ उस मनुष्य शरीरधारी विष्णु श्रीराम से महर्षि कौशिक पूर्वकालिक वृत्तान्त को बतलायेंगे ॥३९। महर्षि कौशिक की बातों को सुनकर धर्मज्ञ श्रीराम कहेंगे, इसमें इसका दोष तो है नहीं दोष तो इन्द्र का है ॥४०॥ श्रीराम के इस तरह कहने पर निन्दित रूप का परित्याग करके और दिव्य रूप धारण करके तुम मेरे गृह में आओगी ॥४१॥ इसतरह अहल्या को शाप देकर महर्षि गौतम तपस्या करने के लिए वन में चले गये और अहल्या शुष्क रूप को धारण करके मार्ग में पड़ी रही ॥४२॥ श्रीराम की वाणी सुनकर वह महर्षि गौतम के पास चली गयी । गौतम महर्षि भी अहल्या के साथ आज भी स्वर्ग में स्थित हैं ॥४३॥ इन्द्र भी लज्जित होकर दीर्घकाल तक जल में छिपे रहे । जल में रहकर इन्द्र अक्षि नामक देवी की आराधना किये ॥४४॥ उस स्तोत्र के द्वारा देवी प्रसन्न हो गयीं, वे इन्द्र के पास जाकर कहीं कि तुम वरदान माँगो ॥४५॥ उसके बाद शत्रुओं को परास्त करने वाले इन्द्र ने देवी से कहा । इन्द्र ने कहा-- हे देवि ! आपकी कृपा से मुनि के शाप के कारण यह विरूपता ॥४६॥ नष्ट हो जाय और मैं पहले के समान अपने राज्य को प्राप्त कर लूँ । श्रीभगवान् ने कहा-- उसके बाद देवी ने मुनि के शाप जन्य पाप को बतलाया कि॥४७॥ मैं तथा ब्रह्मा इत्यादि भी इस शाप को मिटा नहीं सकते है, किन्तु मैं ऐसी वुद्धि की सृष्टि कर देती हूँ कि लोग इसको देख नहीं पायेंगे ॥४८॥ इन योनियों के भीतर तुम्हारी एक हजार आँखें हो जायेंगी और सहस्राक्ष के नाम से प्रसिद्ध होकर तुम अपना राज्य करोगे ॥४९॥ मेरे वरदान के कारण मेष का ही अण्डकोश तथा लिङ्ग तुम्हारे अण्डकोश
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