Srishti Khanda Extracted Page 753

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-753

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Sanskrit Original

अ श्रीपद्ममहापुराण एतस्मिन्नंतरे विप्र मुनेर्हद्यासकल्मषम् । ततो ध्यानं समारभ्याजानाद् वृत्तं शचीपतेः ॥२५॥ तूर्णमेवद्वारदेशे गत्वा च समुपस्थितः। शक्रो मुनिं तु संलक्ष्य चौतुदेहं विवेशह ॥२६॥ गच्छतः पृषदंशस्य पद्धतौ प्रचचाल ह। मुनिस्तत्रावदत्तंवै कस्त्वं मार्जाररूपधृत् ॥२७॥ भयात्तस्य मुनेरग्रे शक्रः प्रांजलिरास्थितः । मघवंतं पुरो दृष्ट्वा चुकोप मुनिपुंगवः ॥२८॥ मुनिरुवाच यत्त्वया चेदृशं कर्म भगार्थं छलसाहसम् । कृतं तस्मात्तवांगेषु सहस्तरभगमुत्तमम् ॥२९॥ भवत्विह तु पापिष्ठ लिंगं ते निपतिष्यति । गच्छ मे पुरतो मूढ सुरस्थानं दिवौकसः॥३०॥ पश्यंति मुनिशार्दूला नराः सिद्धास्सहोरगाः । श्रीभगवानुवाच एवमुक्त्वा मुनिश्रेष्ठो रुदंतीं तां पतिव्रताम् ॥३९॥ पप्रच्छ किमिदानी ते कर्मदारुणमागतम्। इत्युक्त्वा वेपमाना सा भीता पतिमुवाच ह॥३२॥ अहल्योवाच अज्ञानाद्यत्कृतं कर्म क्षंतुमर्हसि वै प्रभो । मुनिरुवाच परेणाभिगतासित्वममेध्या पापचारिणी ॥३३॥ अस्थिचर्मसमाविष्टा निर्मासा नखवर्जिता । चिरंस्थास्यसि चैकापि त्वां पश्यंतु जनाः स्त्रिय:॥३४॥ श्रीभगवानुवाच दुःखिता तमुवाचेदं शापस्यांतो विधीयताम् । इत्युक्ते करूणाविष्टो मन्युनापि परिप्लुतः ॥३५॥ जगाद गौतमो वाक्यं रामो दाशरथिर्यदा। वनमभ्यागतो विष्णुः सीतालक्ष्मणसंयुतः ॥३६॥ कहकर इन्द्र ने अपना मनोरथ पूर्ण किया ॥२४।॥ उसी समय महर्षि के हृदय में कल्मष (पाप) का उदय हुआ । उसके बाद ध्यान करके उन्होंने इन्द्र के पाप को जान लिया ॥२५॥ शीघ्र ही वे दरवाजे पर जाकर खड़े हो गये । मुनि को देखकर इन्द्र ने विडाल का रूप बना लिया ॥२६॥ जाती हुयी बिल्ली के पीछे महर्षि चलने लगे । मुनि ने कहा तुम विडाल का रूप बनाये हुए कौन हो ?॥२७॥ भयभीत होकर इन्द्र महर्षि के समक्ष हाथ जोड़कर खड़े हो गये इन्द्र को देखकर महर्षि क्रुद्ध हो गये ॥२८॥ मुनि ने कहा-- तुमने भग की प्राप्ति के लिए इसतरह का साहसिक कर्म किया है अतएव तुम्हारे सम्पूर्ण शरीर में एक हजार भग के चिह्न हो जायेंगे ॥२९॥ हे पापी ! तुम्हार लिङ्ग गिर जायेगा । मूर्ख मेरे सामने से हटो और देवलोक चले जाओ ॥३०॥ मुनिश्रेष्ठ, मनुष्य तथा सिद्ध सब तुम्हारे अङ्गो में भगों को देख रहे हैं श्रीभगवान् ने कहा--- इसतरह से कहकर मुनिश्रेष्ठ, पतिव्रता अहल्या से पूछे कि तुमने इस प्रकार का पाप कर्म क्यों की ? इसतरह से पूछने पर कापती हुई भयभीत अहल्या बोली ॥३२॥ हे प्रभो! मैंने आज्ञानवशात् इस कर्म को किया है, आप क्षमा करे । मुनि ने कहा- दूसरे के साथ संगम करने के कारण अपवित्र और पापिनी हो गयी हो ॥३३॥ तुम हड्डी और चमड़े में प्रवेश करके मांस और नख से रहित होकर यहाँ दीर्घकाल तक पड़ी रहोगी और स्त्री पुरुष तुम्हें देखेंगे ॥३४॥ श्रीभगवान् ने कहा-- दुखिता अहल्या ने कहा मेरे इस दुःख का अन्त कब होगा, इसतरह से क्रुद्ध मुनि करुणाक्रान्त हो गये ॥३५॥ महर्षि गौतम ने कहा जब महाराज दशरथ के पुत्र भगवान् विष्णु ही राम रूप में सीता और लक्ष्मण के साथ तुम्हें देखेंगे ॥३६॥ तुमको देखकर

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