Srishti Khanda Extracted Page 752

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-752

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Sanskrit Original

साध्वी च गृहशौचे च गृहवस्तुनि तत्परा । प्रवृत्ता देववस्तूनां बलिं कर्तु तत्परा ॥१३॥ इंधनं वह्िकार्य च नित्यकर्मानुसंचयम् । एतस्मिन्नन्तरे शक्रो मुनेस्तस्य महात्मनः ॥१४॥ रूपमास्थाय गात्रेण प्रविवेशोटजं मुदा । पतिव्रता पतिं दृष्ट्वा श्रद्धया परया सती ॥१५॥ देवस्थाने च वस्तूनां संचयं कर्तुमुद्यता। ततस्तामब्रवीदार्तो मुनिवेषधरो हरिः ॥१६॥ इन्द्रउवाच प्रद्युम्रवशगो वामे देहि मे चुंबनादिकम् । श्रीभगवानुवाच एतस्मिन्नंतरे सा च त्रपायुक्ता ब्रवीद्वच: ॥१७॥ अहल्योवाच देवकार्यादिकं त्यक्त्वा वक्तु नार्हसि मे प्रभो । सर्वं जानासि धर्मज्ञ पुण्यानां निश्चयं मुने॥१८॥ अयमर्थो हि वेलायामधुनैव न युज्यते। श्रीभगवानुवाच ततस्तां चारुसवांगीं दृष्ट्वा मन्मथपीडितः ॥१९॥ इन्द्र उवाच अलं प्रिये न वक्तव्यं हच्छयो मे प्रजायते । कर्तव्यं चाप्यकर्तव्यं पत्युर्वचनसंमतम् ॥२०॥ करोति सततं या च सा च नारी पतित्रता। लंघयेद्याच तस्याज्ञां सुरते च विशेषतः ॥२१॥ पुण्यं तस्याभवेन्नष्टं दुर्गतिं चाधिगच्छति। साब्रवीद्देववस्तूनि संति देवार्थतो मुने ॥२२॥ नित्यकर्माणि चान्यानि किं वा तेषु विपर्ययः । स चोवाच सतीं तत्र देह्यालिंगादिक मम ॥२३॥ मनसा भयमुत्सृज्य मया दत्तानि तानि च । इत्युक्त्वा तां परिष्वज्य कृतस्तेन मनोरथः ॥२४॥ वहाँ जाने के बाद जो घटना हुयी उसे आप सुनें । एक बार महर्षि गौतम स्नान करने के लिए पुष्कर तीर्थ में गये। १२।। साध्वी अहल्या घर की वस्तुओं को साफ कर रही थी उसके बाद वह घर के वास्तु देवता की पूजा कर रही थी ॥१३॥ नित्य अग्निहोत्र के लिए इन्धन एकत्रित कर रही थी उसी समय महर्षि गौतम का रूप बनाकर इन्द्र।। १४।। उस आश्रम में प्रवेश किए । पतिव्रता साध्वी अहल्या अत्यन्त श्रद्धा पूर्वक ।।१५॥ देवताओं के स्थान पर वस्तुओं को एकत्रित करने लगी ॥१६॥ उसके बाद मुनि का वेष बनाये हुए आर्त इन्द्र अहल्या से बोले ॥१७॥ इन्द्र ने कहा- हे सुन्दरि ! मैं कामार्त हूँ मुझे चुम्बन इत्यादि दो । श्रीभगवान् ने कहा-- उस समय लज्जित होकर अहल्या बोली अहल्या ने कहा-- हे प्रभो ! देवकार्य छोड़कर आप मुझसे ऐसी बातें न करें । हे मुने ! आप तो पुण्यों के विषय में पुर्णरूप से ज्ञाता हैं ॥१८। इस समय में ऐसा कार्य करना उचित नहीं हैं । श्रीभगवान् ने कहा-- उसके बाद सर्वाङ्ग सुन्दरी अहल्या को देखकर काम पीडित ॥१९॥ इन्द्र ने कहा-- हे प्रिये ! अपनी बातें बन्द करो, मेरे हृदय में सन्ताप हो रहा है । पत्नी को पति की कर्तव्य तथा अकर्तव्य सारी बातों को मानना ही चाहिए ॥२०॥ इसतरह से करने वाली ही स्री पतिव्रता कहलाती है । विशेष रूप से सुरत के विषय में पति की आज्ञा को नहीं मानने वाली नारी ॥२१॥ का पुण्य नष्ट हो जाता है । और वह नरक में जाती है । श्रीभगवान् ने कहा-- अहल्या ने कहा देवताओं के कार्य के लिए यहाँ देव वस्तुएँ हैं ॥२२॥ दूसरे नित्यकर्म करने है, उनमें दोष नहीं होगा क्या ? इन्द्र ने कहा तुम मेरा आलिङ्गन इत्यादि करो ॥२३॥ मन में भय न करो मैं तुम्हारा अलिङ्गन कर रहा हुँ । इसतरह से

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