Srishti Khanda Extracted Page 751
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-751
Sanskrit Original
श्रीपद्ममहापुणण चौवनवाँ अध्याय श्रीभगवानुवाच अद्रोहकस्य चाख्यातो महिमा लोकदुःसहः । एकतल्पगतां वामां क्षान्त्वा सर्वजितोभवत्॥१॥ ज्ञानिनामपि दुः साध्यं मुनीनां ब्रह्मचारिणाम् । सुगसुरमनुष्याणां विषमं तत्समं गतः ॥२॥ स्वभावाद्विषमं कामं जेतुं कः पुरुषः क्षमः । अद्रोहकमृते विप्र स एव भवजित्पुमान्॥३॥ अहल्याहरणादेव सुरेशस्य भगांकता । पुनर्देव्याः प्रसादाच्च सहस्राक्षेति विश्रुतः ॥४॥ विदितं सर्वलोके च त्रैलोक्ये सचराचरे । द्विज उवाच कथं च देवदेवस्य अहल्याहरणं प्रभो ॥५॥ भगांकत्वं च संप्राप्य सहस्राक्षः सुराधिपः । नगांकोपि भगांकत्वं संप्राप्तस्सुरराट्कथम् ॥६॥ दुःश्रुतं सुरवैकल्यं श्रोतुमिच्छामि तत्वतः । श्रीभगवानुवाच पुरा स्वांतोद्धवां कन्यां लोकेशश्च महामनाः ॥७॥ गौतमाय ददौ धाता लोकपालाग्रतो मुदा। ततस्तु लोकपालानां मन्मथाविष्टचेतसाम् ॥८॥ शचीपतेस्तु संमोहो हृदिशल्य इव स्थितः । लोकपालानतिक्रम्य सुवेषा वरवणिनी ॥९॥ द्विजाय रत्मभूतैषा दत्ता कि वा करोम्यहम् । इति संचित्य तस्यास्तु वर्तमाने च यौवने॥९०॥ पुनश्च मायया दृष्टं रूपं तस्यास्सुशोभनम् । पुनश्चिन्तयमानोऽसौ गौतमाध्यासनं गतः ॥९९॥ पश्चात्तु तस्यगमनाद्यादवृत्तं तच्छृणुष्वमे । एकदा गौतमः स्नातुं गतोऽसौ पुष्करं प्रति॥१२॥ काम के दुर्जयत्व का वर्णन, अहल्या तथा इन्द्र का चरित्र श्रीभगवान् ने कहा-- संसारी जीवों के लिए असंभव मैंने अद्रोहक का चरित्र बतलाया है । उसने एक ही शय्या पर सोयी हुयी सुन्दरी को निष्काम होकर देखने के कारण संसार पर विजय प्राप्त कर लिया ॥१॥ यह कार्य ज्ञानियों, मुनियों, ब्रह्मचारियों, देवताओं, असुरों तथा मनुष्यों के लिए करना असंभव है । वह विषम परिस्थति में भी समदर्शी बना रहा ॥२॥ हे विप्र ! अद्रोहक को छोड़कर दूसरा कौन ऐसा पुरुष होगा ? जो स्वभाव से ही विषय काम को जीत ले ॥३॥ अहल्या का अपहरण करने के कारण ही इन्द्र के शरीर में हजारों भगों (योनियों) के चिह् हो गये बाद में वे देवी की कृपा से सहस्राक्ष हो गये ॥४॥ यह प्रसङ्ग त्रैलोक्य के चराचर में प्रख्यात है । ब्राह्मण ने पूछा-- हे प्रभो ! किस तरह अहल्या का अपहरण करने से देवराज इन्द्र की भगाङ्कता हुयी और बाद में वे सहस्राक्ष हो गये । पर्वतों का विदारण करने वाले इन्द्र भगाङ्क कैसे हो गये ? देवताओं की इस प्रकार की विकलता कभी नहीं सुनी गयी उसे आप बतलायें । श्रीभगवान् ने कहा-- पूर्व काल में अपने से उत्पन्न कन्या अहल्या का विवाह ब्रह्माजी ने गौतम महर्षि से कर दिया । उसके बाद कामाविष्ट अन्तःकरण वाले लोकपालों में श्रेष्ठ इन्द्र को अत्यन्त अज्ञान हो गया वे अत्यन्त कष्ट का अनुभव किए कि लोकपालों को छोड़कर सुन्दरी अहल्या ।॥८-९॥ का विवाह गौतम से हो गया अब में क्या करूँ ? इसतरह से विचार कर अहल्या के युवती होने पर ॥१०॥ इन्द्र ने माया पूर्वक अहल्या के सुन्दर रूप को देखा इसके बाद विचार करते हुए इन्द्र, गौतम ऋषि के आश्रम में गये॥११॥
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