Srishti Khanda Extracted Page 750
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-750
Sanskrit Original
कि वा हरिहरौ ब्रह्मा किंवा शक्रो बृहस्पतिः। किं वा मच्छलनादेव साक्षाद्धर्म इहागतः ॥६९॥ श्रीभगवानुवाच इत्युक्ते क्षपणश्चासौ स्मितो वचनमब्रवीत् । क्षपण उवाच विज्ञातुं चैव वो धर्ममहं विष्णुरिहागतः ॥७०॥ विमानेन दिवं गच्छ सकुटुंबो महामुने। मत्रसादाच्च युष्माकं सदैव नवयौवनम् ॥७१॥ भविष्यति महाप्राज्ञ भाग्यानंतं प्रलप्स्यथ । श्रीभगवानुवाच दिव्याभरणसंयुक्ता दिव्यव्रस्त्रोपशोभिताः ॥७२॥ गतास्ते सहसा नाकं सर्वैर्बधुजनैर्वृताः । एवं द्विजवर श्रेष्ठलो भत्यागाद्ययुर्दिवम् ॥७३॥ तुलाधारस्तथाधीमान् सत्यधर्मप्रतिष्ठितः । येन जानाति त्वद् वृत्तं देशांतरसमुद्धवम् ॥७४॥ तुलाधारसमो नास्ति सुरलोके प्रतिष्ठितः । तस्मात्त्वमपि भूदेव समं गत्वा दिवं ब्रज ॥७५॥ य इदं शृणुयान्मर्त्यः सर्वधर्मप्रतिष्ठितः । जन्मजम्मार्जितं पापं तत्क्षणात्तस्य नश्यति ॥७६॥ सकृत्पठनमात्रेण सर्वयज्ञफलं लभेत् । लोकानां पुरतो विप्र देवानामर्च्यतां ब्रजेत् ॥७७॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिष्टिखंडे शुद्रस्यालोभाख्यानं नाम त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥५३॥ re (४) 2 ) इसतरह की ज्ञान, चेष्टायें और भाषण क्यों करता है ॥६८॥ यह विष्णु, ब्रह्मा, शिव, इन्द्र अथवा बृहस्पति में से कोई है क्या ? अथवा मुझे छलने के लिए स्वयं धर्म ही यहाँ आ गये हैं ॥६९॥ इसतरह से पूछने पर उसने मुस्कुराते हुए कहा में विष्णु हूँ, क्षपणक रू से यहाँ आया हूँ तुम्हारे धर्म की परीक्षा करने के लिए आया हूँ ॥७०॥ हे महामुने ! तुम इस विमान से अपने परिवार क साथ स्वर्ग लोक जाओ मेरी कृपा से तुमलोगों की युवावस्था सदैव बनी रहेगी । तुम्हारा अनन्त सौभाग्य होगा तुमलोग सदैव दिव्य अलङ्कारो तथा वस्रं से सुशोभित रहोगे ॥७१-७२॥ उसके बाद वे सब सहसा अपने बान्धवों के साथ स्वर्ग लोक में चले गये । हे द्विजश्रेष्ठ ! लोभ का त्याग करने के कारण वे स्वर्गलोक गये ॥७३॥ यह बुद्धिमान तुलाधार भी सत्य के पालन में प्रतिष्ठित है उसी के कारण दूसरे देश के भी वृत्तान्तों को जानता है ॥७४॥ अतएव तुलाधार के समान देवलोक में भी कोई सत्य वक्ता नहीं है । अतएव तुम भी सबों के प्रति समदृष्टि होकर स्वर्गलोक को प्राप्त करो ॥७५॥ जो इस प्रसङ्ग का श्रवण करता है, वह धर्म में स्थिर हो जाता हे और उसके समस्त जन्मों के पाप विनष्ट हो जाते हैं ॥७६॥ इस कथा को देव पूजक लोगों के समक्ष एक बार पढने से ही पढने वाले को समस्त यज्ञां के करने का फल प्राप्त हो जाता है ॥७७॥ इसतरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के शूद्र की निर्लोभता का वर्णन नामक तिरपनवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।५३।। kee
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