Srishti Khanda Extracted Page 749
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-749
Sanskrit Original
सत्रीणां च जन्मना वाता वसुयोगेन लभ्यते । भूतभव्यप्रवृत्तानां सुकृतं दुष्कृतं च यत् ॥५८॥ तस्माद्ृहुधनं यस्य तस्य भोग्यं यदृच्छया । स्वर्ग वितरणादेव लप्स्यसे ह्ाचिरादितः ॥५९॥ शूद्र उवाच अकामाच्च व्रतं सर्वमक्रोधात्तीर्थसेवनम् । दयाजप्यसमा शुद्धं संतोषो धनमेव च ॥६०॥ अहिंसा परमासिद्धिः शिलोछवृत्तिरुत्तमा । शाकाहारः सुधा तुल्य उपवासः परंतप ॥६१॥ संतोषो मे महाभोग्यं महादानं वराटकम् । मातृवत्परदाराश्च परद्रव्याणि लोष्ठवत् ॥६२॥ परदारा भुजंगाभाः सर्वयज्ञ इदं मम । तस्मादेनं न गृह्णामि सत्यं सत्यं गुणाकर ॥६३॥ प्रक्षालनाद्धि पंकस्य दूरादस्पर्शनं वरम्। श्रीभगवानुवाच इत्युक्ते तु नरश्रेष्ठ पुष्पवर्षं पपात ह ॥६ ४॥ मूर्ध्नि देशे तनौ तस्य सर्वदेवेरितं द्विज । देवदुंदुभयो नेदुर्तृत्यंत्यप्सरसांगणाः ॥६५॥ जगुर्गधर्वपतयो विमानं चापतदिवः । ऊचुर्देवगणास्तत्र विमानमिदमारुह ॥६६॥ सत्यलोकं समासद्य भुंक्ष्व भोग्यं महेंद्रवत् । संख्यातेनापि वर्तेत भोग्यकालस्य धार्मिक ॥६७॥ श्रीभगवानुवाच इत्युक्तेषु च देवेषु शूद्रो वचनमब्रवीत् । शूद्र उवाच कथं निर्ग्रथकस्यास्य ज्ञानं चेष्टास्य भाषणम् ॥६८॥ और न औँषिधियों को पा सकता है । वह अपने शरीर की भी रक्षा नहीं कर सकता और न शत्रुओं पर विजय ही प्राप्त कर सकता है ॥५७॥ धनवानों की ही जन्म से स्त्रियों के साथ बातें होती हैं, भूतकालिक भविष्यत् कालिक तथा वर्तमान कालिक, पुण्य तथा पाप की प्रवृत्ति धन से ही होती है ॥५८॥ अतएव जिसके पास बहुत अधिक सम्पत्ति है, उसके ही मनोनुकूल भोगों की प्राप्ति होती है । धन का ही दान करके तुम स्वर्ग की प्राप्ति कर सकते हो ॥५९॥ शूद्र ने कहा-- हमारा तो सन्तोष ही धन है । कामना रहित होने से ही हमारे सारे व्रत पूरे हो गये, क्रोध रहित होना ही हमारा तीर्थाटन है, दया ही मन्त्रों के जप के समान है ॥६०॥ अहिंसा मेरी सर्वश्रेष्ठ सिद्धि है, शिलोञ्छ ही सर्वोत्तम वृत्ति है, शाको का भोजन अमृत के समान है और उपवास करना ही सबसे बड़ी तपस्या है ॥६१॥ मेरे लिए संतोष ही सबसे बड़ा धन है और कोड़ी का दान देना ही मेरे लिए महादान है । मेरे लिए दूसरों की पत्नियाँ माता के समान हैं और दूसरों की सम्पत्ति मिट्टी के ढेले के समान है ॥६२॥ दूसरे की स्री को सर्पिणी के समान समझना ही मेरा सबसे बड़ा यज्ञ है । हे गुणाकर इन्हीं सभी कारणों से इस धन को मैं नहीं लेता हुँ, यह सत्य वाणी है । कीचड़ लगाकर उसको धोने की अपेक्षा उसको नहीं छूना ही अच्छा होता ह । हे ब्राह्मण जिस समय वह इस प्रकार की बातें कर रहा था, उसी समय उसके शिर तथा शरीर पर देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की, देवगण दुन्दुभि को बजाने लगे, अप्सरायें नृत्य करने लगी ॥६-६५॥ गन्धर्व सङ्गीत करने लगे और आकाश से विमान पृथिवी पर उतारा देवताओं ने उससे कहा तुम इस विमान पर बैठो ॥६६॥ सत्य लोक में जाकर इन्द्र के समान भोगों को भोगो। हे धार्मिक ! तुम्हारा भोग का काल अनन्त है ॥६७॥ देवताओं के इसतरह कहने पर शूद्र ने कहा यह क्षपणक
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