Srishti Khanda Extracted Page 748
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-748
Sanskrit Original
क्षपणक उवाच चाक्षुषं चिरसंशुद्धं हेलया तृणवत्कथम् ॥४५॥ त्वया त्यक्ते यतस्तात नास्ति भाग्यमकंटकम् । ऐश्वर्य मतुलं शौर्यं शीर्यते भावुकं पुनः ॥४६॥ स्वबंधूनां महद: खमाजन्ममरणांतिकम् । द्रक्ष्यसे चात्मना नित्यं मृतानां या गतिर्श्ुवम् ॥४७॥ तस्मात्तदगृह्यतां तूर्णं भुंक्ष्व भोग्यमकंटकम् । ऐश्वर्यमतुलं शौर्यं लोकानां विस्मयं वरम् ॥४८॥ शूद्र उवाच न मे वित्ते स्पृहा चास्ति धनं संसारवागुरा। तद्विधौ पतितो मर्त्यो नपुनर्मोक्षकं व्रजेत् ॥४९॥ शृणु वृत्तस्य यद्दोषमिहलोके परत्र च । भयं चोराच्च ज्ञातिभ्यो राजभ्यस्तत्करादपि ॥५०॥ सर्वे जिघांसवो मर्त्याः पशुमस्यविविष्किराः । तथाधनवतां नित्यं कथमर्थास्सुखावहा:॥५ १॥ प्राणस्यांतकरोह्यर्थस्साधको दुरितस्य च । कालादीनां प्रियं गेहं निदानं दुर्गतेः परम् ॥५२॥ क्षपणक उवाच यस्यार्थास्तस्य मित्राणि यस्यार्थास्तस्य बांधवाः। कुलं शीलं च पांडित्यं रूपं भोग्यं यशः सुखम् ॥५३॥ घनेन तु विहीनस्य पुत्रदारोज्झतस्य च । कथं मित्रं कथं धर्म दीनानां जन्मनः कथम्॥५४॥ सत्वादि क्रतुकार्यं च पुष्करिव्युपकारकाम्। दानं नाकस्य सोपानं निःस्वस्य च नसिद्धयति॥५५॥ ब्रतकार्यस्थ रक्षा च धर्मादि श्रवणं भृशम्। पितृयज्ञादितीर्थं च निर्वित्तस्य न सिद्धयति ॥५६॥ तथा रोगप्रतीकारः पथ्यमौषधसंचयम्। रक्षणं विग्रह श्चैव शत्रूणां विजयो ध्रुवम् ॥५७॥ बतलाओ क्या कह रहे थे क्षपणक ने कहा-- जो अत्यन्त शुद्ध वस्तु आखों से दिखायी पड़े उसको तृणवत् क्यों समझे ॥४५॥ चूकि तुमने उसे वैसा ही समझा है अतएव तुम्हारा भाग्य ठीक नहीं है । ऐश्वर्य अतुलनीय पराक्रम है, जो भावुक होता है, वह शीर्ण (विनष्ट) हो जाता है ॥४६॥ तुम अपने बान्धवों के महान दुःख को जन्म से मरण पर्यन्त देखोगे तथा जैसे मरे हुओं की गति होती है, वैसी ही तुम्हारी गति होगी ॥४७॥ इसलिए उस धन को तुम शीघ्र लो और भोगों का अकण्टक (निर्विघ्न) भोग करो । ऐश्वर्य अतुलनीय पराक्रम है, वह लोगों को विस्मित कर देता है ॥४८॥ शुद्र ने कहा-- धन में मेरी कोई स्पृहा नहीं है, वह संसार बन्धन का जाल है । धन के बन्धन में बँधा मनुष्य पतित हो जाता है । संसार में पतित मनुष्य मोक्ष नहीं प्राप्त कर सकता है ॥४९॥ इस लोक में तथा परलोक में जो धन के दोष हैं, उंसे आप सुनें धन को विषय में चोरों, दायादों तथा राजा से भय सर्वदा बना रहता है ॥५०॥ सभी पशु तथा मछली बेचने वाले लोग उसको मार डालना चाहते हैं जब धनिको की यह स्थिति है तो धन सुखप्रद कैसे हो सकता है 2॥५१॥ धन प्राणान्त करने वाला है वह पाप को बढाने वाला है, वह काल आदि का प्रिय आश्रय स्थान है, तथा नरक प्राप्ति का सर्वोत्कृष्ट साधन है ॥५२॥ क्षपणक ने कहा-- धनवानों के ही मित्र और बान्धव होते हैं । धनवानों को ही कुल शील नामक गुण, पाण्डित्य, रूप, भोग्य पदार्थ, यश तथा सुख की प्राप्ति होती है ॥५३॥ धनहीन पुरुष को तो उसके पुत्र तथा पत्नी भी त्याग देते हैं, जन्म से ही दरिद्रों को मित्र तथा धर्म की प्राप्ति कैसे हो सकती है 2॥५४॥ जिसके पास धन नहीं है, वह न तो सात्त्विक यज्ञो को कर सकता है, न लोगों के उपकारक बावलियों आदि को बनवाकर दान कर सकता है और स्वर्ग की सीढी रूपी दोनों को भी नहीं कर सकता है ॥५५॥ वह न तो व्रत कर सकता है, न धर्म की रक्षा कर सकता है, वह शास्रों का श्रवण, श्राद्ध और तीर्थ भी नहीं कर सकता है ॥५६॥ वह अपने रोगों का न तो प्रतिकार कर पाता है, न पथ्य का सेवन कर पाता है
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