Srishti Khanda Extracted Page 747
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-747
Sanskrit Original
कफ श्रीपद्ममहापुराण तस्य या तस्य देशे तु दृष्टं तेन तदद्भुतम् । अलंविधानमेतत्तु कृत्रिमं चोपलक्ष्यते ॥३ १॥ ग्रहणे वा धुनाचास्य अलोभं नष्टमेव मे । अस्यैव रक्षणेकष्टमहंकारपदंत्विदम्॥३ २॥ यतोलोभस्ततो लाभो लाभाल्लोभः प्रवर्तते । लोभग्रस्तस्य पुंसश्च शाश्चतोनिरयो भवेत्॥३३॥ यदि नो विगुणं वित्तं यदा वेश्मनि तिष्ठति । तदा मे दारपुत्राणामुन्मादो ह्युपपद्यते॥३४॥ उन्मादात् कामसंजातविकारान्मतिविभ्रमः । भ्रमान्मोहोप्यहंकारः क्रोधलोभवतः परम्॥३५॥ एषां प्रचुरभावाच्च तपः क्षयं गमिष्यति । क्षीणे तपसि वर्तते पंकाश्चित्तप्रमोहकाः ॥३६॥ तैश्च शृंखलयोगैश्च बद्धो नैवोद्भतिं ब्रजेत्। एतद्विमृश्य शूद्रोसौ परित्यज्य गृहं गतः ॥३७॥ स्वस्था देवा मुदा तत्र साधुसाध्विति चाब्रुवन्। निर््रथिरूपमादाय तस्यांतिक गृहं तथा ॥३८॥ गत्वाहं दैवसंवादमवदं भूतवर्तनम् । ततोभ्यासप्रसंगाच्च जनानां च परिप्लवात् ॥३९॥ तस्य योषा तदागत्य पप्रच्छ दैयकारणम्। ततोहमवदं तस्य यद्दाचेतो गतं द्रुतम्॥४०॥ निभृतोऽथ निनादस्य कारणं कथितं मया । हद्रतं पतिना तेद्य विधिना दत्तमज्ञवत् ॥४९॥ परित्यक्तं महाभागे पुनर्नास्तीहते वसु। यावज्जीवति दौर्विध्यं तस्य भोक्ता न संशय: ॥४२॥ गच्छ मातर्गृहंशून्यमलब्धं तत्प्रपृच्छतम् । श्रुत्वा तद्वैेशिवं सा च वचनं पत्युरंतिके ॥४३॥ गत्वाप्रोवाचदुर्वृत्तं तच्छुत्वा विस्मयं गतः । स विचिंत्य तया सार्धमागतोऽसौ ममांतिकम् ॥४४॥ निभृतं मामुवाचेदं क्षपणत्वं च कीर्तय। जाता नहीं था ॥३०॥ जब वह उस स्थान पर गया तो उस अद्धुत पदार्थ को देखा तो उसने सोचा ऐसा तो कभी होता नहीं है, लग रहा है यह किसी की चाल है ॥३१॥ यदि मैं, इसको ले लेता हूँ तो मेरी निर्लोभता नष्ट हो जायेगी । इसकी रक्षा करने में भी कष्ट है, धन से मन में अहङ्कार भी आ जा सकता है ॥३२॥ जिससे लोभ होता है, उसीसे लाभ हाता है और फिर लाभ से लोभ बढता है । और जो पुरुष लोभग्रस्त होता है, उसको शाश्वत नरक की प्राप्ति होती है ।।३३॥। यदि हमारे घर में गुण रहित धन रहे तो फिर मेरी पत्नी और पुत्रों को उन्माद हो जायेगा।।३४।। उन्माद से काम जन्य विकार उत्पन्न हो जाता है उससे बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है भ्रम से मोह और (अहङ्कार होता है) और उसके बाद क्रोध तथा लोभ उत्पन्न हो जाते हैं ॥३५॥ इन सबों का प्राचुर्य हो जाने पर मेरे तप का नाश हो जायेगा । तपस्या के क्षीण हो जाने पर चित्त में मोह उत्पन्न होने वाले पाप उत्पन्न हो जाते हैं ॥३६॥ उन पापों की बेड़ी में बँधे हुए मनुष्य का उद्धार नहीं होता है । इन सारी बातों का विचार करके वह शूद्र अपने घर चला गया॥३७॥ उस समय स्वर्ग में विद्यमान देवता साधु-साधु का उच्चारण करने लगे । उसके बाद क्षपणक का रूप धारण करके मैं उसके घर गया ॥३८। वहाँ जाकर मैं सबों की भूतकालिक घटनाओं को में बतलाता था । उसके बाद अभ्यास वशात् लोग बहुत अधिक आने लगे ॥३९॥ उसकी पत्नी भी मेरे पास आयी और मुझसे अपने भाग्य के विषय में पूछी । उसके बाद मैने उन सारी बातों को बतला दिया जो उसके मन में था ॥४०॥ उसको मैंने एकान्त में उसके निनाद का कारण बतलाया ॥४१॥ तुम्हारे पति को ब्रह्मा ने मूर्ख बना दिया है । उसको जो धन मिला उसका उसने परित्याग कर दिया ॥४२॥ तुम्हारा पति जब तक जीवित रहेगा तब तक उसकी दरिद्रता बनी रहेगी । हे माँ तुम अपने घर शीघ्र जाओ और उस धन के विषय में पूछो । उसकी मंगलमयी बाणी को सुनकर वह अपने पति के पास जाकर पूछी ॥४३॥ उसने जाकर उस बुरे समाचार को सुनाया तो उसे सुनकर शूद्र आश्चर्यित हो गया। कुछ विचार करके वह शूद्र अपनी पत्नी के साथ मेरे पास आया ॥४४।। वह एकान्त में आकर मुझसे कहा क्षपणक
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