Srishti Khanda Extracted Page 746
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-746
Sanskrit Original
च अ कॉक सृष्टिखण्ड ७२१ तुलाधारो महात्मा वै सत्यवाक्ये प्रतिष्ठित: । लोके तत्सदृशो नास्ति सत्यवाक्यस्य कारणात्॥१७॥ अश्वमेधसहस्रेण सत्यं तु तुलया धृतम्। अश्चमे्यसहस्राद्धि सत्यमेव विशिष्यते ॥१८॥ सर्व सत्याद्धवेत्साध्यं सत्यो हि दुरतिक्रम । सत्यवाक्येन सा धेनु बहुला स्वर्गगामिनी॥१९॥ सर्वराष्टरं समाधाय पुनरावृत्ति दुर्लभा। तथायं सर्वदा साक्षी मृषा नास्ति कदाचन ॥२०॥ बह्वर्घमल्पमर्ध च क्रयविक्रयणे सुधीः । सत्यवाक्यं प्रशस्तं च विशेषात्साक्षिणो भवेत् ॥२१॥ साक्षिणः सत्यमुक्त्वा च अक्षयं स्वर्गमायुः । वावदूकः सभां प्राप्य सत्यं वदति वाक्पतिः ॥२२॥ स याति ब्रह्मणो गेहं यज्ञैरन्यैश्च दुर्लभम् । सभायां यो वदेत्सत्यमश्वमेधफलं लभेत् ॥२३॥ लोभादद्वेषान्मृषोक्त्वा च रौरवं नरकं व्रजेत् । सर्वसाक्षी तुलाधारो जनानां शूर एव च ॥२४॥ विशेषाल्लोभ संत्यागान्नाके निर्जरतां ब्रजेत् । कश्चिच्छूद्रो महाभागो न लोभे वर्तते क्वचित्॥२५॥ वृत्तिशशाकेन दुःखेन तथा शिलोञज्छतो भृशम्। जर्जरं वस्त्रयुग्मंच करौपात्रे च सर्वदा॥२६॥ सदापि लाभविरहो न परस्वं गृहीतवान् । तस्यजिज्ञासयैवाहं गृहीत्वा वस्त्रयुग्मकम् ॥२७॥ अवकोटे नदीतीरे स्थितस्संस्थाप्यसादरम्। स दृष्ट्वा वस्त्र युग्मं तन्नलोभे कुरते मनः॥२८॥ इतरस्य परिज्ञाय तत्क्षांत्या स्वगृहं ययौ । ततो विचितयित्वा तु हृदास्वल्पमिति द्विज ॥२९॥ उदुंबरं हेमगर्भ मया तत्रैव पातितम्। किंकरे च नदीतीरे विकोणे जनवर्जिते॥३०॥ बल पर अच्युत स्वरूप हो गये । अतएव सत्य का पालन करने वाला मनुष्य संसार का उद्धार करने में समर्थ होता है ॥१६॥ महात्मा तुलाधार सत्यवादी हैं । सत्यवक्ता होने के ही कारण तुलाधार के समान संसार में कोई भी नहीं है ॥१७॥ हजारो अश्वमेध यज्ञों के करने के फल को सत्य के साथ तराजू पर रखा गया तो हजार अश्वमेध यज्ञों के फल की अपेक्षा सत्य भारी हो गया ॥१८॥ सत्य के द्वारा सब कुछ की प्राप्ति की जा सकती है, सत्य का कोई भी अतिक्रमण नहीं कर सकता है । सत्यवाक् होने के कारण ही वह गौ स्वर्ग लोक में चली गयी ॥१९॥ सम्पूर्ण राष्ट्र को एकत्रित करके, संसार में पुन: आगमन नहीं होता है, उसीतरह से यह तुलाधार सर्वदा साक्षी है, वह कभी मृषाभाषण नहीं करता है ॥२०॥ वह बहुत मूल्य वाली तथा अल्प मूल्य वाली वस्तुओं का क्रय तथा विक्रय करने में निपुण है ।साक्षी व्यक्ति की सत्यवाणी प्रशस्त (श्रेष्ठ) होती है ॥२१॥ साक्षी व्यक्ति सत्य ही बोलकर अक्षय स्वर्ग को प्राप्त कर लेते हैं । सभा में जाकर वह वावदूक, बृहस्पति के समान सत्य बोलता है ॥२२॥ वह सत्यभाषी दूसरे यज्ञा से दुर्लभ ब्रह्मलोक से जाता है । जो सभा में सत्य बोलता है वह अश्वमेध के फल को प्राप्त करता है ॥२३॥ लोभ तथा द्वेष के कारण झूठ बोलने वाला रौरव नरक में जाता है ।तुलाधार सर्वसाक्षी हैं और मनुष्यों में शूरवीर हैं॥२४॥ विशेष रूप से लोभ का परित्याग करने वाला स्वर्गलोक में जाकर देवत्व को प्राप्त कर लेता है । कोई महाभाग शूद्र था, वह कभी भी लोभ नहीं करता था ॥२५॥ वह शाक तथा शिलोञ्छ वृत्ति से जीवन निर्वाह बड़े कष्ट के साथ करता था । उसके पास पुराने दो वस्र थे और वह हाथ में ही भोजन कर लेता था ॥२६॥ उसको कभी भी कुछ नहीं मिलता था फिर भी वह किसी दूसरे की कोई वस्तु नहीं लेता था । उसके सत्य की परीक्षा करने के लिए मैने दो वस्र लेकर ॥२७॥ एकान्त में नदी के तट पर रख दिया । उसने उन दोनों वस्रों को देखा, किन्तु उसके मन में लोभ नहीं आया ॥२८॥ उसने समझा के ये किसी दूसरे के वस्र हैं और वह शान्ति पूर्वक अपने घर चला गया । हे द्विज ! उस समय उसके हृदय में विद्यमान मैंने सोचा कि उन वसतो को बहुत थोडा समझकर उसने नहीं लिया है ॥२९॥ उसके बाद मैंने गूलर के फल में सुवर्ण भरकर वहीं पर गिरा दिया वह नदी का तट एकान्त था कोई वहाँ आता
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