Srishti Khanda Extracted Page 745

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-745

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Sanskrit Original

|“) A) fy श्रीपद्ममहापुराण भगवानुवाच । सत्यभावादलोभाच्च दद्याद्योवै त्वमत्सरात् । नित्यं यज्ञशतं तस्य सुनिष्पन्नं सुदक्षिणम् ॥२॥ सत्येनोदयते सूरो वाति वातस्तथैव च। नलंघयेत्समुद्रस्तु वेलां कूर्मो धरां तथा॥३॥ सत्येन लोकास्तिष्ठेति सर्वे च वसुधाधराः । सत्याद्भष्टोथ यः सत्वोप्यधोवासी भवेद् धुवम् ॥४॥ सत्यवाचि रतो यस्तु सत्यकार्यरतःसदा। स॒ शरीरेण स्वलोंकमागत्याच्युततां ब्रजेत् ॥५॥ सत्येन मुनयः सर्वे मां च गत्वा स्थिरं गताः। सत्याद्युधिष्ठिरो राजा सशरीरो दिवं गतः ॥६॥ सर्वशत्रुगणं जित्वा लोको धर्मेण पालितः । अकरोच्च मखं शुद्धं राजसूयं सुदुर्लभम् ॥७॥ चतुरशीति सहस्त्राणि ब्राह्मणानां च नित्यशः । भोजयेद्रुक्मपात्रेषु राजोपकरणेषु च ॥८॥ भोजयित्वोपकरणांस्तेभ्यो दत्वा विसर्जयेत् । यदभीष्टं द्विजातीनामतोन्यद्दापयेद्धनम् ॥९॥ अदरिद्रं ततो ज्ञात्वा द्विजव्यूहं परित्यजेत्। तथैवस्नातकानां तु सहस्त्राणि तु षोडश ॥ नित्यं संभोजयेद्राजा सत्येनैव विमत्सरः ॥१०॥ अतिष्ठंत गृहे पूर्व चिरं तस्य जिगीषया। जितं तेन जगत्सर्वं प्राणानुम्रहकारणात् ॥११॥ सत्येन चासुरो राजा बलिरिंद्रो भविष्यति । पातालस्थस्य तस्यैव भूयस्तिष्ठामि वेश्मनि॥९२॥ निरंतरं च तिष्ठामि स्वाते पुण्यैक कर्मणः। यद्वा पुरा मया बद्धो दैत्ययोनेर्विमोक्षणात् ॥१३॥ तलंचैवामरत्वं हि शक्रत्वं प्रददाम्यहम् । हरिश्चंद्रो नृपस्सत्यात्सवाहनपरिच्छदः ॥१४॥ स्वशरीरेण शुद्धेन सत्यलोके प्रतिष्ठितः । राजानो बहवश्चान्ये ये च सिद्धा महर्षयः ॥९५॥ ज्ञानिनो यतय श्चैव सर्वेसत्येऽ च्युताभवन् । तस्मात्सत्यतो लोके संसारोद्धरणक्षमः॥९१६॥ होकर, दान करता है, वह प्रतिदिन दक्षिणा दान पूर्वक सौ यज्ञों के करने का फल प्राप्त करता है ॥२॥ सत्य के द्वारा सूर्य उदित होते हैं, वायुदेव वते हैं, समुद्र अपने तट को पार नहीं करते हैं और कूर्म भगवान् पृथिवी को घारण करते हैं ॥३॥ सत्य पर सारे लोक टिके हुए हैं, सम्पूर्ण पर्वत टिके हैं, जो मनुष्य सत्य से भ्रष्ट हो जाता है, उसका अध: पतन अवश्य होता है ॥४॥ जो सदा सत्य बोलता है और सत्य कार्य करता है वह सशरीर स्वर्गलोक में जाकर भगवत्स्वरूप हो जाता है ॥५॥ सत्य के ही द्वारा सभी मुनिजन मुझको प्राप्त करके स्थिर हो गये । सत्य के ही बल पर सशरीर राजा युधिष्ठिर स्वर्ग चले गये ॥६॥ उन्होंने सभी शत्रुओं को जीतकर धर्मपूर्वक राज्य किया, उन्होंने अत्यन्त दुर्लभ राजसूय यज्ञ भी किया ॥७॥ वे प्रत्येक दिन चौरासी हजार ब्राह्मणों को समस्त राजोपकरणों के साथ सुवर्ण के पात्र में भोजन कराते थे ॥८॥ भोजन कराकर उन सभी उपकरणों को उन ब्राह्मणों को ही प्रदान करके उन्हें विदा करते थे ॥९॥ जब उन्होंने जान लिया कि अब कोई ब्राह्मण दरिद्र नहीं रहा तो उन्होने ब्राह्मणों को भोजन कराना बन्द किया । उसीतरह सत्य के बल पर वे प्रतिदिन सोलह हजार स्नातकों को भोजन बिना किसी मत्सर के कराते थे ॥१०॥ उनको जीतने की इच्छा से उनके घर में दीर्घकाल तक पाण्डवों पर कृपा करने वाले श्रीभगवान् बने रहे ॥११॥ सत्य के ही बल पर असुरों के राजा बलि इन्द्र होयेंगे । राजा बलि पाताल में रहते हैं, और में उनके यहाँ भी रहता हूँ ॥१२॥ पुण्य कर्म करने वाले बलि के अन्तःकरण में में निरन्तर रहता हूँ । उस राजा को मोक्ष प्रदान करने के लिए ही मैंने उसे बाँधा था ॥१३॥ पाताल में ही मैंने अमरत्व तथा इन्द्रत्व प्रदान किया हे । सत्य के ही बल पर राजा हरिश्चन्द्र अपने वाहन तथा परिच्छदों के साथ ॥१४॥ अपने शुद्ध शरीर से सत्यलोक में प्रतिष्ठित हैं बहुत से राजागण, सिद्धगण, महर्षिण ॥१५॥ ज्ञानी पुरुष, संन्यासीगण ये सबके सब सत्य के ही

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