Srishti Khanda Extracted Page 744

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-744

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Sanskrit Original

अतिक्कुद्धेप्यसन्तुष्टे षट्सु कन्या नदीयते। एतेभ्यः कन्याकां दत्वा नरकं चाधिगच्छति ॥९६॥ लोभात्संमानलाभाच्च कन्यका परिवर्तनातू। मुनीनांप्रेयसीं नारी युवती रूपशालिनीम् ॥९७॥ सालंकारां सशय्यां च दत्वाऽनंत फलं लभेत्। अनयोश्च फलं तुल्यं युवती कन्ययोरपि ॥९८॥ एका वराय दातव्या अपरा ब्राह्मणाय तु । क्रीता देवाय दातव्या धीरेणाकष्टकर्मणा॥९९॥ कल्पकालंभवेत्स्त्वर्ग नृपोवा कौमहाधनी। प्रतिजन्मलभेतैष सुपत्नी वरवर्णिनीम् ॥१००॥ यं इदं शृणुयान्नित्यं पुण्याख्यानमनुत्तमम् । सर्वपापक्षयस्तस्य सर्वशास्तरार्थपारगः ॥१ ० १॥ लभेत सोऽक्षयं स्वर्ग नारीणां वल्लभो भवेत् । क्षत्रियो विजयी चाथ लोकनाथोभवेदश्ुवम् ॥१०२॥ श्रुतं हरति पापानि जन्मजन्मकृतानि च । सौभाग्यं लभते लोके तथैव च वरांगना ॥१०३॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे पंचाख्याने स्रीणामाख्यानं नाम द्विपंचाशत्तमोऽध्यायः ॥५२॥ —— ie तिरपनवाँ अध्याय द्विज उवाच तुलाधारस्य चरितं प्रभावमतुलं प्रभो। वक्तुमर्हस्यशेषेण यदिमय्यस्त्यनुग्रहः ॥१॥ ४. अत्यन्त गरीब हो, ५. जो कुलहीन हो तथा ६. जो मूर्ख हो । १. अत्यन्त दीन, २. अत्यन्त रोगी, ३. अत्यन्त निकट रहने वाले, ४. अत्यन्त क्रोधी और ६. असन्तुष्ट इन छह व्यक्तियों को भी कन्यादान न करें । इन सबों को कन्या दान करने वाला नरक में जाता है ॥९४-९६॥ लोभ के कारण, सम्मान प्राप्त करने के लिए तथा कन्या का परिवर्तन करके भी मनुष्य नरकगामी होता है । युवती, रूपवती तथा प्रियतमा नारी को मुनियों को अलंकार तथा शय्या के साथ दान देकर मनुष्य अनन्त फल को प्राप्त करता है । इन दोनों युवती कन्याओं को दान का फल तुमको भी प्राप्त होगा । एक कन्या वर को दे और दूसरी कन्या ब्राह्मण को दान दे । धैर्यशाली व्यक्ति को तथा कठोर कर्म करने वाले को चाहिए कि वह खरीद कर भी कन्या देवता को दे ॥९७-९९॥ ऐसा करने वाला व्यक्ति एक कल्प तक स्वर्ग में रहकर फिर पृथिवी पर महाधनी होता है । वह प्रत्येक जन्मों में सुन्दर पत्नी को प्राप्त करता है।१००॥ जो व्यक्ति इस पवित्र आख्यान का श्रवण करता है, उसके सारे पाप विनष्ट हो जाते है और वह सभी शास्रं में पारंगत होता है ॥१०१॥ वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त कर नारियों का प्रियतम होता है । क्षत्रिय विजयी तथा लोकों का स्वामी होता है ॥१०२॥ इसका श्रवणकरने से जन्म जन्मान्तर में किए गये पाप विनष्ट हो जाते हें वह लोक में सौभाग्य तथा सुन्दर पत्नी को प्राप्त करता है ॥१०३॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के पञ्चाख्यान वर्णनान्तर्गत स्ब्रियों का आख्यान वर्णन नामक बावनबें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।५२।। ee तुलाधार वैश्य का चरित, सत्य की प्रशंसा, निर्लोभत्व की प्रशंसा, और निर्लोभ शूद्र का वर्णन ब्राह्मण ने कहा-- हे प्रभो ! यदि आपकी मुझपर कृपा है तो आप मुझे तुलाधार के चरित और उसके अतुल प्रभाव को बतलाइये ॥१। श्रीभगवान् ने कहा-- जो व्यक्ति सत्यता पूर्वक, बिना किसी लोभ के, मत्सर हीन

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