Srishti Khanda Extracted Page 743
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-743
Sanskrit Original
तथैव बालवैधव्या दासीत्वमुपगच्छति । द्विज उवाच कन्यादानफलं ब्रूहि वद दास्याः फलं च यत् ॥८३॥ विधानं च यथोक्तं च यदि मेऽनुग्रहः प्रभो । श्रीभगवानुवाच रूपाढ्ये गुणसंपन्ने कुलीने यौवनान्विते ॥८ ४॥ समृद्धे वित्तसंपूर्णे कन्यादानफलं शृणु । सर्वाभरणसंयुक्तां कन्यकां यो ददाति च ॥८५॥ तेन दत्ता धरा सर्वा सशैलवनकानना । अर्द्धाभरणदानेन फलं दातुर्भवेदश्ुवम् ॥८६॥ अनाभरणकन्यायाः पादैकस्य फलं भवेत् । यः पुनः शुल्कमश्राति स याति नरके नरः ॥८७॥ विक्रीय चात्मजां मूढो नरकान्न निवर्त्तते । लोभादसदूशे पुंसि कन्यां यस्तु प्रयच्छति ॥८८॥ रौरवं नरकं प्राप्य चांडालत्वं च गच्छति । अतएव हि शुल्कं च जामातुर्न कदाचन ॥८९॥ गृह्णाति मनसा प्राज्ञो यद्दतं तस्य चाक्षयम्। भूमिं गां च हिरण्यं च धनं वस्त्रं च धान्यकम्॥९०॥ जामातु यौतकं दत्वा सर्व भवति चाक्षयम्। विवाहसमये वत्स सगोत्रपरगोत्रजैः॥९ १॥ यौतकं दीयते किंचित्तत्सर्वं चाक्षयं भवेत्। दाता न स्मरते दानं प्रतिग्राही न याचते॥९२॥ उभौ तौ नरकं यातश्छिन्नरज्जुर्घटो यथा। अवश्यं यौतक दानं दातव्यं सात्विकेन हि ॥९३॥ अदत्वा नरकं प्राप्य दासीत्वमुपगच्छति । अत्यासन्नेतिदूरस्थे चात्याढ्ये चातिदुर्गते॥९४॥ कुलहीने च मूर्खे च षट्सु कन्या न दीयते। अतिवृद्धे चाति दीने रोगिष्ठे देशवासिनि॥९५॥ मनुष्य का जन्म प्राप्त करती है ॥८२॥ उसके बाद वह बालविधवा होकर दासी का काम करती है । ब्राह्मण ने कहा-- आप कन्यादान करने का फल बतलाएँ तथा दासी के फल को बतलायें ॥८३॥ आप की यदि मुझ पर कृपा है तो आप मुझे कन्यादान की विधि को बतलायें । श्रीभगवान् ने कहा-- रूपवान्, सम्पत्ति सम्पन्न, कुलीन, युवा।८४॥ समृद्ध, धन संपत्ति से परिपूर्ण वर को कन्यादान करने का फल सुनो । ऐसे वर को जो सभी आभूषणों से सजाकर कन्या का दान करता है ।॥८४-८५॥ उसको पर्वत तथा वनों से युक्त सम्पूर्ण पृथिवी का दान करने का फल प्राप्त होता है । आधा आभूषण देने का फल आधा होता है ॥८६॥ आभरण (भूषण) रहित कन्या का दान करने पर उसके चौथाई फल होता है । जो व्यक्ति शुल्क लेकर उसका दांन करता वह नरकगामी होता है ॥८७॥ अपनी पुत्री को बेचने वाले मूर्ख का नरक से उद्धार नहीं होता है । लोभ के कारण जो व्यक्ति अयोग्य वर को कन्या देता है वह ॥८८॥ रौरव नरक में जाने के बाद चाण्डाल योनि में जन्म लेता है । अतएव कभी भी दामाद से शुल्क नहीं लेना चाहिए ॥८९॥ बुद्धिमान मनुष्य दहेज के रूप में मन से जो कुछ भी भूमि, गौ, सुवर्ण, धन, वस्न, अन्न देता है उसका अक्षय फल होता है ॥९०॥ हे वत्स ! विवाह के समय अपने गोत्र वाले तथा दूसरे गोत्र वाले जो कुछ भी दामाद को दहेज देते हैं, उसका अक्षय फल होता है । दहेज में दिए गये दान का स्मरण यदि न तो दाता और गृहीता उस दहेज का स्मरण दिलाकर न माँगे तो दाता और ग्रहीता दोनों नरकगामी होते हैं उसी तरह जिसतरह रस्सी के टूट जाने पर घड़ा रस्सी को भी लेकर डूब जाता है । अतएव सात्त्विक पुरुष को दहेज का दान अवश्य देना चाहिए ॥९१-९३॥। दहेज के दान को नहीं देने वाला जन्मान्तर में दास बनता है । छह लोगों को कन्या का दान नहीं करना चाहिए १. जो अत्यन्त सन्निकट में हो, २. जो अत्यन्त दूर का हो, ३. अत्यन्त धनिक हो, ही
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