Srishti Khanda Extracted Page 742
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-742
Sanskrit Original
सा स्वर्गमात्मघातेन नात्मानं नपतिं नयेत् । नम्रियेत समं गत्वा ब्राह्मणी ब्रह्मशासनात्॥७ ०॥ प्रब्रज्या गतिमाप्रोति मरणादात्मघातिनी । नरोत्तम उवाच सर्वासामपि जातीनां ब्राह्मण: शस्य इष्यते ॥\७ ९॥ पुण्यं च द्विजमुख्येन अत्र कि वा विपर्ययः । श्रीभगवानुवाच ब्रा्मण्यास्साहसं कर्म नैव युक्तं कदाचन ॥७२॥ निःशेषेऽ स्यावधं कृत्वा स नरो ब्रह्महा भवेत् । तस्माद्वाह्मणजातीया विप्रया च व्रतं चरेत्॥७३॥ प्रवक्ष्यामि यथातथ्यं श्ृणु विप्र यथार्थतः । आपणांतरमामिष्यं भक्षयेन्न कदाचन ॥७४॥ अश्वमेधसहस्राणां हायने फलमाप्नुयात्। अर्हणं चेष्टदेवस्य हरेर्ब्रतमनुत्तमम् ॥७५॥ स्वामिनोऽपि जलं पिंडं संप्रद्यादमत्सरात्। युगकोटिसहस्राणि युगकोटिशतानि च ॥७६॥ पतिना सह सा साध्वी विष्णुलोके युता भवेत् । ततो महाव्रतं प्राप्य निरये ब्राह्मणी वधूः ॥७७॥ उद्धरेदुभर्योवंशाञ्छतशोऽथ सहस्रशः । अतोबंधुजनैरेव ु त्रैरभ्रात्रादिभिर्बुधैः ॥७८॥ विनियम्य सदा तस्या ब्रतलोपं न कारयेत्। हरेश्चेद्वासरं प्राप्य विधवा न व्रतं चरेत् ॥७९॥ पुनर्वैधव्यतामेति जन्मजन्मनि दुर्भगा । भोजनात्मत्स्यमांसस्य व्रतानां विप्रयोगतः ॥८०॥ चिरं निरयमासाद्य शुनी भवति निश्चितम्। दुष्टाया मैथुनं गच्छेद्विधवा कुलनाशिनी ॥८१॥ नरकाननुभूयाथ गृध्रिणी दश जन्मसु। द्विजन्मफेरवा भूत्वा ततो मानुषतां ब्रजेत् ॥८ २॥ के मर जाने पर उसका अनुगमन करती है ॥६९॥ वह आत्मघात करके पति को स्वर्ग नहीं पहुँचा पाती है, ब्रह्माजी की आज्ञा के अनुसार व्राह्मण की पत्नी को पति के साथ नहीं मरना चाहिए ॥७०॥ आत्मघात करने वाली वह प्रत्रज्या (संन्यास) की गति को प्राप्त करती है । नरोत्तम ने कहा-- सभी जातियों में ब्राह्मणों को श्रेष्ठ कहा गया है ॥७१॥ और द्विज श्रेष्ठ के द्वारा किया गया पुण्य भी श्रेष्ठ कहा गया है, इस विषय में क्यों उल्टा कहा गया है । श्रीभगवान् ने कहा-- ब्राह्मणी के लिए साहसिक कर्म करना कभी उचित नहीं होता है ॥७२॥ क्योंकि पति के मर जाने पर इसका वध करने वाला ब्रह्मघाती हो जाता हे । अतएव ब्राह्मण जातीय ब्राह्मणी को व्रत करना चाहिए ॥७३॥ हे विप्र! मैं वास्तविक वात बतला रहा हुँ उसे तुम सुनो । वह दूसरे दुकान के बने मांस को कभी न खाय ॥७४॥ ऐसे व्रत का एक वर्ष तक पालन करने से उसे हजारो अश्वमेध करने का फल प्राप्त होता है । वह अपने इष्टदेव की पूजा करे तथा श्रेष्ठ एकादशी व्रत करे ॥७५॥ वह विना किसी मत्सर के अपने स्वामी को भी जलदान तथा पिण्डदान करे। ऐसी विधवा ब्राह्मणी करोड़ों हजार तथा करोड़ों सौ युगों तक ॥७६॥ वह साध्वी विष्णुलोक में अपने पति के साथ आनन्दित होती है । उसके बाद वह ब्राह्मणी वधू इस महाव्रत का पालन करके नरक में स्थित दोनों (पति और पिता) के हजारो वंश का उद्धार कर देती है । अतएव बाँधवों, पुत्रों तथा भाई आदि के द्वारा उसको नियमित करके ऐसे रखना चाहिए कि उसके व्रत का लोप न हो । यदि विधवा एकादशी व्रत नहीं करे तो ॥७८-७९॥ वह अभागिनी जन्म-जन्मान्तर तक विधवा होती है । मांस मछली के खाने से तथा एकादशी व्रत नहीं करने से ॥८०॥ वह दीर्घकाल तक नरक में रहकर कुतिया होती हैं । जो कुल का नाश करने वाली विधवा मैथुन करती है ॥८ १॥ वह नरक में निवास करने के बाद दश जन्मों तक गिधिनी होती है । उसके बाद दो जन्मों तक लोमड़ी होने के बाद
No translation available yet.
Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know