Srishti Khanda Extracted Page 741

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-741

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

पुराणेमत्कथां श्रुत्वा मत्सादृश्यं लभेन्नरः । कथयित्वा पुराणं च विष्णुसायुज्यतां ब्रजेत् ॥५६॥ तस्मान्नित्यं च श्रोतव्यं पुराणं धर्मसंचयम् । श्रावितव्यं प्रयत्नेन लोके विष्णुतनुं व्रजेत् ॥५७॥ अन्यद्वास्त्रीकृते दोषे यथायोगं भवेद् ध्रुवम् । निशामय प्रवक्ष्यामि तत्वतो द्विजनंदन॥५८॥ सर्वबीजस्य दानेन सांबुकुम्भं महाफलम् । दद्याद्विप्राय पुण्याहे सद्यः पूतो भवेत्क्षणात् ॥५९॥ सर्व धान्यादिकं बीजं कालेदद्याद्विजातये । सर्वपापक्षयं कृत्वा अक्षयं स्वर्गमश्नुते ॥६०॥ गुणं वक्ष्यामि विप्रर्षे सतीनां यादृशं दृढम्। शुद्धवंशो भवेत्तस्या नित्यं लक्ष्मीः प्रवर्तते॥६ १॥ उभयोर्वशयोः स्वर्गो भर्तुरात्मम एव च । पतिव्रता गुणोविप्र विस्मृतः पृच्छतस्तव ॥६२॥ पुनर्वक्ष्यामि योषाणां सर्वलोकहितं शुभम्। उषित्वा पूर्वकालं च पुण्यापुण्येन योषितः ॥६३॥ पश्चात्पतिब्रतायाश्च॒ ताश्चगच्छति मद्वतिम् । षण्मासं वाथ वर्ष वा अधिकं च प्रशस्यते ॥६४॥ पतिब्रताभवेद्या च यावत्पूता व्रजेहिवम् । सुराप विप्रहंतारं सर्वपापयुतं पतिम् ॥६५॥ घङ्कात् पूतन्येत्स्वर्गं भर्त्तारं यानुगच्छति । कंदर्पसदूशो भर्ता सा रतीवमनोरमा ॥६६॥ जिष्णोरेव चिरंलोके भुंक्तेऽनंतमयं सुखम्। पतिव्रता बलाद्याच विदूरे स्वामिपातने॥६७॥ चिह्नं लब्ध्वा मृता वह्नौ पापादुद्धरते पतिम्। पतिव्रता च या नारी देशांतरमृते पतौ ॥६८॥ सा भर्तुश्चिह्रमादाय वह्वौ सुप्त्वादिवं व्रजेत् । या स्त्री ब्राह्मणजातीया मृतं पतिमनुव्रजेत् ॥६९॥ झी अधिक फल मेरे गोविन्द नाम के कीर्तन से होती हैं ॥५४।॥ ऐसा करने वाला पुरुष मेरे अक्षय लोक में निवासकरता है । वह जन्म लेकर गृहस्थ राजा होता हैं ॥५५॥ पुराण में मेरी कथा सुनकर मनुष्य मेरे सायुज्य को प्राप्त करता है । पुराणों की कथा कहने वाला भगवान् विष्णु के सायुज्य को प्राप्त करता है ॥५६। अतएव धर्मो के संग्रह रूप पुराण का प्रतिदिन श्रवण करना चाहिए । पुराण को सुनाने वाला भगवान् विष्णु के शरीर में लीन हो जाता है॥५७॥ दूसरी स्त्री के साथ संबन्ध करने वाले को जिस पाप की प्राप्ति होती है ब्राह्मण उसे मैं बतलाता हूँ सुनो॥५८॥ जल भरे कुम्भ के साथ सभी प्रकार के बीजों का दान पित्र दिन को ब्राह्मण को दान करने से वह पाप विनष्ट हो जाता है ॥५९॥ सभी अन्नों की उत्पत्ति के समय ब्राह्मण को वह दान देना चाहिए । ऐसा करने वाला अपने सभी पापों को विनष्ट करके अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥६०॥ हे विप्रर्षि ! सती स्त्रियो के गुणों को मैं बतला रहा हूँ । सती स्त्री का वंश शुद्ध होता है और उसके गृह में नित्य ही लक्ष्मी आती हैं ॥६१॥ ऐसा पति और पिता दोनों के वंश में होता है । हे विप्र ! तुमने जो पूछा था उस पतिव्रता के गुणों को बतलाना मैं भूल गया था।६ २॥ उसको मैं फिर इसलिए कह रहा हूँ कि उससे खियों का कल्याण होता है । पहले पुण्य के फलस्वरूप स्त्रिया रहकर पुन: जो पतिब्रता हो जाती हैं वे सद्गति को प्राप्त करती है । छह मास, या एक वर्ष या उससे अधिक समय तक पतिव्रता रहना श्रेष्ठ है ॥६३-६४॥ जो पतिव्रता होती है, वह पवित्र होकर स्वर्गलोक जाती है । जो पतिव्रता पत्नी होती है, वह मदिरा पीने वाले ब्रह्महत्या करने वाले, तथा सभी प्रकार के पापों को करने वाले भी पति क्रे पाप रूपी पंक से पवित्र बनाकर उसे स्वर्ग पहुँचा देती है । उसका पति कामदेव के समान और वह रति के समान हो जाती है ॥६५-६६॥ यह भगवान् विष्णु के ही लोक में अनन्त सुख को पतिव्रता के वल से ही भोगता है, जिस खरी का पति दूर रहकर मर जाता है ॥६७॥ और वह उसके किसी चिह्न को लेकर अग्नि में प्रवेश करके मर जाती है तो वह पति का पापों से उद्धार कर देती है । जिस पतिब्रता नारी का पति विदेश में मर जाता है ॥६८॥ वह पति के चिह् को लेकर यदि अग्नि में सोकर मर जाती है, तो वह स्वर्गलोक को प्राप्त करती है । जो ब्राह्मण की पत्नी पति

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know