Srishti Khanda Extracted Page 740
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-740
Sanskrit Original
पितृव्यां मातुलानीं तु तथैव च पितृष्वसाम् । मातृष्वसादिकामन्यां गत्वा नास्ति च निष्कृतिः ॥४४॥ ब्रह्महा सभवेदंधो वचसा जडतां ब्रजेत् । कर्णयोर्बधिरो जातश््यवते नास्ति निष्कृतिः ॥४५॥ उक्ता अशलीमत्यर्थमखिलं स्त्रीकृते नहि। द्विज उवाच एवं दुष्कृतमासाद्य कथं मोक्षो भवेत्पुनः ॥४६॥ तत्समाचक्ष्व भगवन् श्रोतुमिच्छामितत्त्वतः । श्रीभगवानुवाच तासां च गमनं कृत्वा तप्तां लोहस्य पुत्तलीं ॥४ ७॥ समालिंग्य त्यजेत्प्राणं शुचिलोकांतरं व्रजेत् । यो वै गृहाश्रमं त्यक्त्वा मच्चित्तो जायते नर:॥४८॥ नित्यं स्मरति गोविंदं सर्वपापक्षयो भवेत् । ब्रह्महत्यायुतं तेन कृतं गाुर्वङ्गनागमात् ॥४९॥ शतं शतसहस्रं च पेष्टीमद्यस्यभक्षणात् । स्वणदिर्हरणं कृत्वा तेषां संसर्गकं चिरम् ॥५०॥ एतान्यन्यानि पापानि महान्ति पातकानि च । अग्निं प्राप्य यथातूलं तृणं शुष्कं प्रणश्यति ॥५१॥ तस्मान्मन्नामगोविंदं स्मृत्वा पूतो भवेन्नरः । यो वा गृहाश्रमे तिष्ठेन्नित्यं गोविंदघोषणम् ॥५२॥ कृत्वा च पूजयित्वा च स पापात्सन्तरो भवेत्। भागीरथी तटे रम्ये खगस्य ग्रहणे शिवे ॥५३॥ गवां कोटिप्रदानेन यत्फलं लभते नरः। तत्फलं समवाप्नोति सहस्रं चाधिकं च यत् ॥५४॥ गोविंदकीर्तने तात मत्पुरे चाक्षयं वसेत् । कामात्सभवने स्थित्वा सार्वभौमो भवेन्नप: ॥५५॥ राजा की रानी अथवा अपने दूसरे स्वामी की पत्नी, पुत्री, चाची, मामी, बुआ, मौसी अथवा दूसरी स्त्री केसाथ गमन करने वाले पुरुष का कोई भी प्रायश्चित नहीं है, उसका कभी उद्धार नहीं होता है ॥४३-४५॥ जो ब्रह्महत्या करने वाला होता है, वह अन्धा गुंगा, बहरा, होता है, उसका भी उद्धार नहीं होता है । जो स्त्रियों के साथ निर्लज्जता की बातें करता है उसका भी कोई प्रायश्चित नहीं है ॥४६-४७॥ ब्राह्मण ने कहा-- इसतरह के पापों को करने वाले की मुक्ति केसे हो सकती है ? हे भगवन् ! इस बात को आप मुझे बतलायें, उसे मैं सुनना चाहता हूँ ॥४८॥ श्रीभगवान् ने कहा-- उपर्युक्त नारियों के साथ संगम करने वाला पुरुष लोहे की नारी बनाकर उसको आग में खूब संतप्त करे और उसका आलिङ्गन करके अपने प्राणों का परित्याग कर दे तो पवित्र होकर स्वर्गलोक में जाता है॥४९॥ जो मनुष्य गृहस्थाश्रम का परित्याग करके मुझमें ही अपने मन को लगा देता है और सदैव मेरे गोविन्द नाम का स्मरण करता है, उसके भी समस्त पाप क्षीण हो जाते हैं ॥५०॥ यदि कोई हजारों ब्राह्महत्या करता है तथा सैकड़ों गुरुजनों की पत्नियों केसाथ संगम करता है, तथा हजारों लाखों बार पैष्टी मदिरा का पान किया हो सुवर्ण की चोरी की हो, तथा उन सभी पापियों का सङ्ग करता हो, इन सबों के अतिरिक्त दूसरे भी महान् पापों तथा उपपातकों को किया हो, गोविन्द नाम स्मरण करने वाले उन सभी पापियों के पाप नष्ट हो जाते हैं । किन्तु नाम के बलपर पाप करने वाले के पाप नष्ट नहीं होते हें । जिसतरह अग्नि के लगते ही रुई का ढेर जल कर भस्म हो जाता है उसीतरह मेरे गोविन्द नाम का स्मरण करने वाले के भी सारे पाप विनष्ट हो जाते हैं और वह पवित्र हो जाता है । अथवा जो नित्य ही गृहस्थाश्रम में रहकर नित्य गोविन्द नाम का उच्चारण करता है, भगवान् की पूजा करता है, पापों को पार कर जाता है । सूर्यग्रहण के समय भागीरथी के तीर पर स्नान करे तो उसको अक्षय फल की प्राप्ति होती है ॥५१-५३॥ करोड़ों गायों के दान करने से जिस फल की प्राप्ति होती है, उसके हजार गुना अथवा उससे
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