Srishti Khanda Extracted Page 739
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-739
Sanskrit Original
र श्रीपद्ममहापुराण काचित्पातयते नारी काचिदुद्धरते कुलम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन कुलजामुद्दहेद्वुधः ॥३०॥ कुलद्दयं समा नारी समयित्वा तु तिष्ठति । साध्वी तारयते वंशान् दुष्टा पातयति ध्रुवम् ॥३१॥ दारेष्वधीनं स्वर्ग च कुलं पंकं यशोऽयशः। पुत्रं दुहितरं मित्रं संसारे कथयंति च॥३२॥ तस्मादेकां द्वितीयां वा वामामुद्वाहयेृधः । संतानार्थात्तु कामाच्च बहुदोषाश्रिता च सा ॥३३॥ रजस्वलां च वनितां नावगच्छति यः पतिः। ब्रह्महा भ्रूणहा सोपि दुर्गतिं चाधिगच्छति॥३४॥ यो मोहाहुर्भगां कृत्वा साध्वीं त्यजति पापकृत्। तस्या वधेन यत्पापं तद्धुक्त्वा नरकं व्रजेत् ॥३५॥ वनिता हरणं कृत्वा चांडलकुलतां ब्रजेत्। तथैव वनिताहानात्पतितो जायते नरः ॥३६॥ रामां विन्यस्य स्कंधे च चिरं यमपुरे वसेत् । मलमूत्रं शिरोदेशे नित्यं तस्य च संपतेत् ॥३७॥ एवं वर्षसहस्राणि भारं वहति दुर्गतिः । पुनर्यावन्ति लोमानि तावत्स रौरवं व्रजेत् ॥३८॥ पुनः कीटेषु संतीर्णस्तदा मानुषतां ब्रजेत्। ततश्च कलहं शोकं प्राप्रोति पूर्वकल्मषात् ॥३९॥ एवं जन्मत्रयं प्राप्य मुच्यते पातकान्नरः । तत्कालं नरकं भुक्त्वा सा तु काकी तु वञ्चकी॥४०॥ उच्छिष्टनरकं भुक्त्वा मानुषे विधवा भवेत् । यः पुनः श्रांत्यजां गच्छेन्म्लेछांवा पुल्कसां नरः ॥४९॥ द्वित्रिचतुर्गुणं भुक्त्वा तत्र संचीर्णवंचकः । मातरं गुरुभार्यां च ब्राह्मणीं महिषीं तथा ॥४२॥ अन्यां वा प्रभुपत्नीं च गत्वा यात्यपुनर्भवम् । भगिनीं तत्पुत्रभार्या तथा दुहितरं स्नुषाम् ॥४३॥ अपने पितरों के साथ भयङ्कर रौरव नरक में चला जाता है ॥२९॥ कोई नारी वंश का पतन कर देती और कोई नारी वंश का उद्धार कर देती है, इसलिए विद्वान् को चाहिए कि वह सद्वंश में उत्पन्न नारी के ही साथ विवाह करे ॥३०॥ सती सत्री दोनों वंशों (अपने पति तथा अपने पिता के वंश का) उद्धार कर देती है । इसतरह साध्वी नारी वंशों का उद्धार करती है और दुष्टा वंश का पतन कर देती है ॥३१॥ इसीलिए संसार में कहा जाता कि स्त्री के अधीन ही, स्वर्ग, कुल, पङ्क, यश, अपयश, पुत्र, पुत्री और मित्र हैं ॥३२॥ इसीलिए विद्वान् को चाहिए कि वह”एक अथवा दो खियों के साथ विवाह सन्तान की प्राप्ति के लिए करे, काम के लिए विवाह करने पर तो उसमें अनेक दोष आ जाते हें ॥३३॥ जो पति अपनी रजस्वला पत्नी को नहीं समझता है, वह ब्रह्महत्या, श्रूण हत्यारा होता है और नरक में जाता है ॥३४॥ जो मनुष्य साध्वी स्री को दूषित करके उसका परित्याग कर देता है, उसको स्री के वध करने का पाप लगता है, और वह नरकगामी होता है ॥३५॥ जो व्यक्ति किसी खी को बलपूर्वक अथवा धन का प्रलोभन देकर उसक साथ सङ्ग करता है, वह इस लोक में पत्नीघाती और मरने के बाद नरकगामी होता है ॥३६॥ जो मनुष्य किसी की स्त्री का हरण करता है, उसका जन्म चाण्डाल वंश में होता है उसीतरह पत्नी का परित्याग करने से मनुष्य पतित हो जाता है ॥३७॥ जो अपने कन्थे पर पत्नी को बैठाता है वह यमलोक में जाता है और उसके शिर पर सदैव मल एवं मूत्र गिरता रहता है ॥३८॥ इसतरह से वह अज्ञानी एक हजार वर्ष तक भार का वहन करता है । उसके बाद शरीर में जितने रोम (सोढे तीन करोड रोएँ) होते हैं, उतने वर्ष तक रौरव नरक में निवास करता है॥३९॥ उसके बाद उसका जन्म कीड़ों की योनि में होता है, उसके बाद वह मनुष्य होता है ओर उस जन्म में पूर्वकृत पाप के कारण वह कलह तथा शोक को प्राप्त करता है ॥४०॥ इसतरह तीन जन्म तक भोग करके मनुष्य पाप मुक्त होता हैं । वह स्त्री भी मरकर नरक में जाती है, फिर मादा कौआ होती है ॥४१॥ उस जन्म में उच्छिष्ट और गन्दी वस्तु खाकर मनुष्य होकर विधवा होती है । उसका जन्म शूद्र या म्लेच्छ या पुल्कस (कोलभिल) जाति में होता है ॥४२। दोगुना, तीन गुना, या चार गुना भोजन करने वाला नरकगामी होता है । माता, गुरुपत्नी, ब्राह्मणी,
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