Srishti Khanda Extracted Page 738
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-738
Sanskrit Original
नारद उवाच देविसीमंतिनीनां तु दुश्चेष्टं ज्ञातुमुत्सहे। कौतुकेन त्वया चर्या वधूनां संप्रयुज्यते ॥१६॥ सर्वासामपि नारीणां स्वान्तं जानासि तत्त्वतः । तन्मां कथय सर्वेषु विनीतमज्ञमत्र च ॥९७॥ देव्युवाच युवतीनां सदा चित्तं पुंसु तिष्ठत्यसंशयम् । अस्मिन्योनौ सुसंयोग्ये संगते वाप्यसंगते ॥१८॥ सुवेषं पुरुषं दृष्ट्वा भ्रातरं यदि वा सुतम्। योनिः क्लिद्यति नारीणां सत्यं सत्यं हि नारद॥१९॥ स्थानं नास्ति क्षणं नास्ति नास्ति प्रार्थयिता नरः। तेन नारद नारीणां सतीत्वमुपजायते ॥२०॥ घृतकुंभसमा नारी तप्तांगारसमः पुमान्। तस्माद् घृतं च वह्निं च नैकस्थाने च धारयेत्॥२१॥ यथैव मत्तमातंगं सृणिमुहरयोगतः । स्ववशं कुरुते यंता तथास्त्रीणां प्ररक्षकः ॥२२॥ पिता रक्षति कौमारे भर्ता रक्षति यौवने। पुत्राश्चस्थाविरे भावे रस्त्रीस्वातंत्र्यमर्हति ॥२३॥ ततः स्वातंत्र्यभावाच्च स्वेच्छया च वरांगना। पुरुषेणार्थिता धीरा प्रेरणादिचरी भवेत् ॥२४॥ अरक्षणाद्य॒थापाकः श्वकाकवशगो भवेत्। तथैव युवती नारी स्वच्छंदाद्दष्टतां ब्रजेत् ॥२५॥ पुनरेव कुलं दुष्टं तस्यास्संसर्गतो भवेत् । परबीजेन यो जातः स च स्वाद्वर्णसंकरः ॥२६॥ जारजः संकरः पापो नरके नियतं वसेत् । कीटजातौ गता जाताः पुनः सर्वे महीतले ॥२७॥ ततोम्लेच्छमुपानीतं कुलं स्याद् द्विजनंदन । कुलक्षयो भवेद्यस्मात्तस्माुष्टां न धारयेत्॥२८॥ ज्ञात्वैव योषितां दोषं क्षमते यो नराधमः । स॒ तिष्ठेन्निरये घोरे रौरवे पितृभिः सह ॥२९॥ सदैव कथा कहा करते थे । उन्होंने पार्वतीजी को साष्टाङ्ग प्रणाम किया और पार्वतीजी से पूछा ॥१५॥ नारदजी ने कहा-- हे देवि ! मैं कुतूहल वशात् नारियों की चेष्टाओं को जानना चाहता हूँ और आप इसको जानती हैं ॥१६॥ आप सभी नारियों के अन्तःकरण की बात ठीक-ठीक जानती हैं मैं विनीत हूँ और इस विषय में आज्ञ हूँ, उसे आप मुझे बतलाइये ॥१७॥ देवी ने कहा-- निस्सन्देह स्त्रियों का मन सदैव पुरुषों में लगा रहता है, इस मनुष्य योनि में चाहे वह उचित हो या अनुचित ॥१८॥ हे नारद ! सुन्दर वेष वाले पुरुष, भाई तथा पुत्र को भी देखकर खियों की योनि में क्लेदन होने लगता है ॥१९॥ हे नारद ! व्यभिचारयोग्य स्थान, समय तथा प्रार्थयिता के अभाव में ही स्त्रियों का सतीत्व सुरक्षित रह सकता है ॥२०॥ नारी घी के घड़े के समान है और पुरुष तप्त अंगार के समान होता है, इसीलिए घृत के समान नारी को तथा अग्नि के समान पुरुष को एकत्र न रखे ॥२१॥ जिसरह मदमत हाथी को अंकुश और मुग्दर के द्वारा वश में रखा जाता है उसीतरह स्री को नियामक तथा श्रेष्ठ रक्षक ही अपने वश में रख सकते हैं ॥२२॥ खी की कुमार्यावस्था में पिता, यौवनावस्था में पति तथा वृद्धावस्था में पुत्र रक्षा करता है । अतएव स्री को स्वतन्त्रता नहीं देना चाहिए ॥२३॥ इसीलिए स्वतन्त्र होने पर अपनी इच्छानुसार सुन्दर स्त्रिया किसी भी पुरुष के द्वारा प्रार्थना करने पर उसकी इच्छा के अनुसार आचरण करने लगती हैं ।।२४।। जिसतरह रक्षा के अभाव में तैयार भोजन को कुत्ते तथा कौए खा लेते हैं, उसीतरह स्वच्छन्द होने पर नारी दुष्टों की सङ्गति कर लेती है ॥२५॥ उसके संसर्ग के कारण वंश दूषित हो जाता है, दूसरे वीर्य से उत्पन्न होने वाला वर्णसङ्कर कहलाता है ॥२६॥ जारज (पर पुरुष से उत्पन्न) पापी सङ्कर (दोगला) नरकगामी होता है । उसके बाद वह पृथिवी पर सभी कीट योनियों में जन्म लेता है ॥२७॥ हे ब्राह्मण ! उसके बाद दुष्टा नारी के कारण पूरा वंश ही म्लेच्छ जाति का हो जाता है, अतएव दुष्टा नारी को कभी स्वीकार करना चाहिए ॥२८॥ इस तरह स्त्रियों के दोष को जानकर भी जो उसे क्षमा कर देता है वह ne खया
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