Srishti Khanda Extracted Page 737
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-737
Sanskrit Original
श्रीपदामहापुरण हरिरुवाच शिशुभावाच्च मांडव्यो झिल्लिकायामभानतः । वस्तिदेशे तृणं दत्वा मोहात्स च मुमोच ताम् ॥२॥ तेनापवाददोषेण धर्मस्याज्ञातु रेव च । अहोरात्रं व्यथाकृच्छा भुक्ता तेन द्विजन्मना ॥३॥ कितु समाधिना तेन न ज्ञातं शूलसंभवम् । कृच्छं च मुनिना कृत्स्नं योगाभ्यासाद्भृशादपि॥४॥ कुष्ठिनो ब्रह्मणो घातादजितेंद्रियकारणात् । पूतिगंधंतनौ कुष्ठं संजातं द्विजसत्तम ॥५॥ पुरा विप्राय तेनैव दत्तं गौरी चतुष्टयम् । कन्यका त्रितयं विप्र तेन तस्य पतिव्रता ॥६॥ अस्यास्तु कारणादेव स च मत्समतां ब्रजेत् । अत्र ते विस्मयः कुत्र वेदकर्मपुरातनम् ॥७॥ द्विज उवाच कृत्या नारी न यस्यैव तस्य स्वर्गो भवेद् ध्रुवम्। यथैतच्चरितं नाथ सर्वेषां शिवमिष्यते ॥८॥ हरिरुवाच संति कृत्याः स्त्रियः काञ्चित्पुसः सर्वस्वदस्य च । तत्राप्यरक्षणीयां च मनसापि न धारयेत् ॥९॥ न स्त्रीणामप्रिय: कश्चित्प्रियो वापि न विद्यते । गाव स्तृणमिवारण्ये प्रार्थयंति नवं नवम् ॥१०॥ पुमांसं वित्तहीनं च विरूपं गुणवर्जितम् । अकुलीनं च भृत्यं च कामिनी भजते ध्रुवम्॥९१॥ भर्तारं च गुणोपेतं कुलीनं च महाधनम् । सुंदरं रतिदक्षं च त्यक्त्वा नीचं भजेद्वधूः ॥१२॥ उमानारदसंवादमाख्यानं विद्धि भूसुर । येन विद्यःस्त्रियाश्चेष्टा विविधाः कृत्स्नशो द्विज ॥१३॥ स्वभावान्नारदो विप्र विश्वजिज्ञासको मुनिः । स्वांते विमृश्याथगतः कैलासं गिरिमुत्तमम् ॥१४॥ वृषकेतुसदाख्यानसप्रतिष्ठे हिमे गिरौ । प्रणिपत्य महात्मा वै पप्रच्छपार्वतीं मुनिः ॥१५॥ किसी झिंगुर के वस्ति प्रदेश मे तृण खोस कर छोड़ दिया ॥२॥ उस अपवाद दोष के कारण धर्म के ज्ञाता नहीं होने पर भी उनको एक दिन और एक रात तक उस शूल का कष्ट भोगना पड़ा । किन्तु समाधिस्थ होने के कारण उस शूल की वेदना का पता नहीं चला । योग के अभ्यासी होने के कारण मुनि ने उस कष्ट का विल्कुल अनुभव नहीं किया ॥४।॥ कुष्ठी को कुष्ठ इसलिए हुआ कि उसने एक ब्राह्मण की हत्या की थी और जितेन्द्रिय नहीं था । इसीलिए उसके शरीर में पूतिगंध से युक्त कुष्ठ हो गया ॥५॥ पूर्वजन्म में उसने ब्राह्मण को चार गौरियों का दान किया था तथा तीन कन्याआं का दान किया था इसीलिए उसकी पत्नी पतिव्रता हुई ॥६। इसीकारण से वह तथा पतिव्रता मेरे समान हो जायेगे । इस विषय में तुमको आश्चर्य क्यों है, तुम तो प्राचीन कर्मो को जानते हो ॥७॥ द्विज ने कहा-- जिसकी पत्नी कृत्या (व्यभिचारिणी) न हो उसको निश्चित रूप से स्वर्ग की प्राप्ति होती है, जैसा कि इन सबों का चरित्र कल्याणकारी लगता है ॥८॥ श्रीहरि ने कहा--- बहुत सी ऐसी नारियाँ है जो सर्वस्व प्रदान करने वाले पति की भी पत्नी होकर व्यभिचारिणी हो जाती हैं ॥९॥ स्त्रियों का न तो कोई प्रिय होता है और न अप्रिय होता हे जिस तरह वन में गायें नवीन-नवीन घास चाहती है, उसीतरह वे नवीन, नवीन पुरुष चाहती हैं ॥१०॥ निर्धन, कुरूप, गुणहीन, अकुलीन तथा नौकर भी पुरुष को कामुक खियाँ स्वीकार कर लेती हैं ॥११॥ गुणी, कुलीन, महाधनी, सुन्दर, रतिकर्म में निपुण भी पति का त्याग करके स्त्रियाँ नीच पुरुष का सङ्ग कर लेती हैं ॥१२॥ हे द्विज ! तुम उमा नारद संवाद को सुनो उससे तुम स्त्रियों की सारी चेष्टाओं को जान जाओगे ॥१३॥ नारद ऋषि स्वभाव से ही सारी बातों को जानना चाहते थे । अपने मन में विचार करके वे कैलास पर्वत पर गये ॥१४॥ जहाँ पर भगवान् शिव
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