Srishti Khanda Extracted Page 733
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-733
Sanskrit Original
निट श्रीपद्ममहापुराण पतिब्रतोवाच स्वपृष्ठस्थमहं कृत्वा नेष्यामि तद्गृहं प्रति । सिद्ध्यर्थे नयिष्यामि पुनस्तेनैव वर्त्मना॥४६॥ द्विजउवाच कल्याणि त्वत्कृते नैव सर्व मे कृत्यमेष्यति। इदानी यत्कृतं कर्मस्त्रीजनैरपि दुःसहम् ॥४७॥ भगवानुवाच तस्मिश्च नगरे रम्ये नित्यं च धनिनो गृहे। चौरैश्च॒ प्रचुरं वित्तं हृतं राज्ञा श्रुतं तदा ॥४८॥ श्रुत्वा सर्वान्निशाचारानाहूय नृपती रुषा । नृपतिरुवाच जीवितुं यदि वो बांछा चोरं मामद्य दास्यथ ॥४९॥ भगवानुवाच गृहीत्वा तु जृपस्याज्ञां यत्तैर्जिघृक्षया कुलैः । चारैश्चोरोगृहीतस्तै र्बलाच्चेबव नृपाज्ञया ॥५०॥ नगरोपांतदेशे च वृक्षमूले घने वने । समाधिस्थो महातेजा मांडव्यो मुनिपुगवः ॥५९॥ व्यातिष्ठद्टह्विसंकाशो योगिनां प्रवरो मुनिः। अंतर्नाडीगतो वायुः किंचिन्नप्रतिभाति च॥५२॥ तं ब्रह्मतुल्यं तिष्ठन्तं दृष्ट्वा दुष्टा महामुनिम्। चोरोयमद्भुताकारो धूर्तस्तिष्ठति कानने॥५३॥ एवमुक्त्वा तु तं पापा बबन्धुर्मुनिसत्तमम्। नोक्ताश्च नेक्षितास्तेन पुरुषा अतिदारुणाः ॥५४॥ ततो राजा उवाचेदं संप्राप्तस्तस्करो मया। उपांते च पथि द्वारे कुरुध्वं घोरदण्डनम्॥५५॥ मांडव्यश्च मुनिस्तत्र पथिशूले च कीलितः । पायुदेशे च तैर्दत्तं शूलं यावच्च मस्तकम् ॥५६॥ व्यथां स च न जानाति शूलेविद्धतनुर्यमात् । अन्यैरपि कृतोदण्डः कृतस्तैस्तु मनोहितः ॥५७॥ ब्राह्मण ने कहा-- उसके घर मैं कैसे जाऊंगा । मैं अपने से तो जा नहीं सकता हूँ । अतएव मुझको शान्ति कैसे होगी ?, मेरा कार्य कैसे सम्पन्न होगा 2॥४४-४५॥ पतिव्रता ने कहा-- में अपनी पीठ पर बैठाकर आपको उसके घर पहुँचाऊंगी । और आपके सन्तुष्ट हो जाने पर मैं आपको अपने घर लाऊँगी ।४६॥ ब्राह्मण ने कहा-- हे कल्याणि ! तुम से ही मेरा सम्पूर्ण कार्य सिद्ध होगा तुमने यह जो कार्य किया है वह किसी भी स्री के लिए दुःसह है ॥४७॥ श्रीभगवान् ने कहा-- उस नगर में प्रतिदिन धनिकों के घर में चोरों ने बहुत अधिक धन सम्पत्ति चुरा लिया था इस बात को राजा ने सुना ॥४८॥ यह सुनकर क्रुद्ध हुए राजा ने रात्रि में घूमने वाले गुप्तचरों को बुलाकर कहा राजा ने कहा-- यदि तुम लोग जीवित रहना चाहते हो तो चोर को पकड़ कर आज उपस्थित करो ॥४९॥ श्रीभगवान् ने कहा-- राजा की आज्ञा पाकर वे सब रात्रि में चोर को पकड़ने के लिए व्याकुल घूम रहे थे । राजा की आज्ञा से दूतों ने चोर को पकड़ लिया ॥५०॥ नगर के बाहर सन्निकट के बन में महर्षि माण्डव्य समाधि में तपस्या कर रहे थे ॥५१॥ अग्नि के समान तेजस्वी महर्षि बैठे थे । उनकी प्राण वायु नाड़ी में प्रवेश कर गयी थी अतएव उनको कुछ भी पता नहीं चला ॥५२॥ ब्रह्म के सदृश बैठे हुए महर्षि को देखकर गुप्तचरों ने सोचा यह चोर है, रूप बनाये बैठा है ।५३। इसतरह से कहकर वे पापी मुनि को बाँध दिए । किन्तु मुनि ने उन दुष्टों को न तो देखा और न कुछ कहा ॥५४॥ इसके बाद उन सबों ने राजा से कहा कि हमलोगों ने चोर को पकड़ लिया हे । राजा ने कहा नगर के बाहर उसे घोर दण्ड दो ॥५५॥ उन सबों ने माण्डव्य महर्षि को उस शूल में कीलित कर दिया और उनके गुदामार्ग से लेकर ब्रह्माण्ड पर्यन्त शूल ठोक दिया ॥५६॥ शरीर में शूल से बेधने के कष्ट का उनको
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