Srishti Khanda Extracted Page 732

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-732

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Sanskrit Original

सुवर्ण मणिरत्नं वा चेलं वा यन्मनोरथम् । भगवानुवाच तामुवाच तत: साध्वी न मे चार्थे प्रयोजम् ॥३४॥ अस्ति कार्य च ते किञ्जिह्ृदामि कुरुषे यदि । तदा मे हृदि संतोषः कृतं सर्व त्वयाऽ धुना ॥३५॥ गणिकोवाच सत्यं सत्यं करिष्यामि द्रुतं बद पतित्रते कुरु मे रक्षणं मातर्हुतं कृत्यं च मे वद ॥३६॥ भगवानुवाच त्रपया निकृतं वाच्यं तस्यामुक्तं वरं प्रियम्। क्षणं विमृश्य सा वेश्या कृत्वा क्षांतिमुवाच च॥३७॥ कुष्ठिनः पूतिगंधस्य संपर्के दुःखिता भृशम्। दिनैकं च करिष्यामि यद्यागच्छति मद्गृहम्॥३८॥ पतिव्रतोवाच आगमिष्यामि ते गेहमद्य रात्रौ च सुंदरि । भुक्तभोग्यं पतिं दृष्टं पुनर्नेष्यामि मद्गृहम् ॥३९॥ गणिकोवाच गच्छ शीघ्रं महाभागे स्वगृहं च पतिक्रते। पतिस्ते चार्द्वरात्रे स आगच्छतु च मद्गृहम्॥४०॥ बहवो मे प्रियास्संति राजानस्तत्समाञ्चये । एकैको मद्गृहे नित्यं तिष्ठतीह निरंतरम् ॥४९॥ अद्याहं मे गृहं शून्यं करिष्यामि च त्वद्भयात्। स चागच्छतु ते भर्त्ता सचास्मान्प्राप्य गच्छतु ॥४ २॥ भगवानुवाच एतच्छुत्वा तु सा साध्वी गतासौ स्वगृहे तथा । पत्यौ निवेदयामास कृत्यं ते फलितं प्रभो ॥४३॥ अद्या रात्रौ च तहेहं गंतुं ख्यातिं करोति सा। प्रभूताः पतयस्तस्यास्तवकालो न विद्यते ॥४४॥ विप्र उवाच कथं यास्यामि तद्गेहं मया गंतुं न शक्यते । एतज्ज्ञात्वा कुतः क्षांतिः कृतं कार्य कथं भवेत्॥४५॥ रत्न, वस्र जो चाहें सब दूँगी । श्रीभगवान् ने कहा-- उसके बाद उस साध्वी ने कहा मुझे धन नहीं चाहिए । तुमसे ही कुछ काम है, यदि करो तो मैं बतलाऊं उसको करने से ही मेरे हृदय में सन्तोष होगा ।॥३४-३५।। गणिका ने कहा-- हे पतिव्रते ! शीघ्र बतलाओं, उसे मैं अवश्य करूंगी, मैं सत्य कहती हूँ । हे मां आप मेरी रक्षा करें मुझे अपना काम शीघ्र बतलायें ।।३६।। श्रीभगवान् ने कहा-- लजाती हुयी पतिव्रता ने उस कार्य को उसे बतलाया जो कार्य उसके पति को प्रिय था । क्षणभर विचार करके तथा मन शान्त करके वेश्या बोली । दुर्गन्धि से युक्त कोढी से सम्पर्क करने से मुझे दुःख तो बहुत होगा । यदि आपके पति मेरे घर आयें तो एक दिन उनके साथ संगम कर लुँगी।३७-३८॥ पतिव्रता ने कहा-- हे सुन्दरि मैं आज रात में उनको लेकर आऊंगी । अपने पति को भुक्तभोग्य देखकर फिर उन्हें अपने घर ले जाऊगी ॥३९॥ गणिका ने कहा-- हे पतिव्रते ! शीघ्र अपने घर चली जाओ, तुम्हारे पति मेरे घर आधी रात को आ जायं ॥४०॥ मेरे बहुत से राजा तथा राजा के समान पति हैं । उनमें से कोई- न-कोई मेरे घर रहता ही है ॥४१॥ तुम्हारे भय के कारण आज मैं अपना घर उन सबों से रहित रखूँगी । आज आपके पति आ जायँ और मेरा उपभोग करके चले जायँ ॥४२॥ श्रीभगवान् ने कहा-- इस बात को सुनकर वह साध्वी अपने घर चली गयी और अपने पति को बतलायी कि आपका मनोरथ सिद्ध हो गया ॥४३॥ आज रात्रि में उसके घर जाने के लिए उसने कहा है । उसके बहुत से पति हैं, किन्तु आपके समय में वहाँ कोई नहीं रहेगा ।

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