Srishti Khanda Extracted Page 731
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-731
Sanskrit Original
भगवानुवाच श्रुत्वा तेनेरितं वाक्यं साध्वी वचनमत्रवीत् ॥२३॥ हैं पतित्रतोवाच यथाशक्तिकरिष्यामि स्थिरी भव प्रभो धुना । भगवानुवाच मनसाथ समालोच्य क्षपांते ह्युषसि द्रुतम् ॥२४॥ गोमयं|| सह शोधन्या गृहीत्वा सा ययौ मुदा । संप्राप्य गणिकागेहं शोधयित्वा च चत्वरम् ॥२५॥ प्रतोलीं वीथिकां चैव गोमयं प्रददौ मुदा । सा तूर्णमागता गेहे जनस्यालोकने भयात्॥२६॥ एवं क्रमेण सा साध्वी चरतिस्म दिनत्रयम्। अथ सा बारमुख्या च चेटिकाश्चेटकानपि ॥२७॥ अपृच्छत्कस्य कर्माणि शोभनानि च चत्वरे। मयानोक्तेप्युषःकाले कस्य मत्प्रियकारणात् ॥२८॥ रुच्यकर्मणि दीप्यंते रथ्या चत्त्वरवीथिकाः । परस्परेण संचिंत्य वारमुख्यां च तेऽब्रुवन्॥२९॥ चेटका ऊचुः अस्माभिर्नकृतं भद्रे कर्मचैतत्म्रमार्जनम्। ` भगवानुवाच अथ सा विस्मयं गत्वा संचिंत्य रजनीक्षये ॥३०॥ तया च दृश्यते सा च तयैव पुनरागता । दृष्ट्वा तां महतीं साध्वीं ब्राह्मणीं च पतिव्रताम्॥३९॥ दधार चरणे तस्या हा क्षमस्वेति भाषिणी । गणिकोवाच आयुर्देहं च संपत्तिर्यशोर्थः कीर्तिरेव च ॥३२॥ एतासां मे विनाशाय स्फुरसीव पतिव्रते । यद्यत्य्रार्थयसे साध्वि नित्यं दास्यामि तद्दृढम् ॥३३॥ उसकी बातों को सुनकर साध्वी बोली ॥२३॥ पतिव्रता ने कहा-- हे प्रभो ! आप शान्त रहें मैं अपनी शक्ति के अनुसार प्रयास करूंगी । श्रीभगवान् ने कहा-- मन से विचार करके प्रात:काल की बेला में ॥२४॥ वह झाडू तथा गोबर लेकर गयी । वेश्या के घर जाकर उसके चत्वर को झाड़कर ॥२५॥ उसकी प्रतोली तथा गली को गोबर से पोत दिया और दूसरे लोगों को देख लने के भय से प्रतिब्रता अपने घर शीघ्र आ गयी ॥२६॥ इस तरह वह तीन दिन तक करती रही, उसके बाद उस वेश्या ने अपने दासों तथा दासियों से पूछा ॥२७॥ मेरे चत्वर पर यह कौन सुन्दर कार्य करता है, मेरे कहे बिना कौन प्रातःकाल में मेरा प्रिय कार्य करता है ॥२८।। अलङ्करण के कारण मार्ग, चत्वर और वेदियाँ सुशोभित हो रही हैं । उन सबों ने आपस में बातें करके उस वेश्या से कहा । दासों ने कहा-- हे भद्रे ! हमलोगों ने यह सफाई का कार्य नहीं किया है । ् रीभगवान् ने कहा-- उसके बाद वह वेश्या विचार करके बहुत आश्चर्यित हुयी । प्रातःकाल जगी तो ॥३०॥ उसकी दृष्टि उस पतिव्रता पर पड़ी । वह पहले के ही समान आयी थी, उस अत्यन्त साध्वी पतित्रता ब्राह्मणी को देखकर ॥३१॥ उसने उस पतिव्रता के चरणों को पकड़ लिया और कहा क्षमा करो गणिका ने कहा-- पतिव्रते ! लगता है कि आप मेरी आयु, देह, संपत्ति, यश, धन तथा कीर्ति का नाश कर देना चाहती हैं । हे साध्वि ! आप जो चाहें वह में आपको दूँगी ॥३२-३३॥ आप सुवर्ण, मणि,
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