Srishti Khanda Extracted Page 729
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-729
Sanskrit Original
दें श्रीपद्ममहापुराण एकावनवाँ अध्याय नरोत्तम उवाच त्रिदशानां च देवानामन्येषां जगदीश्वरः । प्रभुः कर्ता च हर्त्ता च गोप्ता भर्त्ता पिता प्रसूः॥१॥ अस्माकं वाकश्रमोविष्णोः कथनेनैव युज्यते। किंतु कौतूहलं मेस्ति पिपासा वा क्षुधापि वा ॥२॥ कृतं पृच्छति येनैव वक्तव्यं तत्प्रियेण हि । अतीतं चैव जानाति कथं नाथ पतिव्रता॥३॥ कि वा तस्या प्रभावं च वक्तुमर्हस्यशेषतः। भगवानुवाच कथितं मे पुरा वत्स पुनः कौतूहलं द्विज ॥४॥ कथयिष्यामि तत्सर्व यत्ते मनसि वर्तते। पतिव्रता पतिप्राणा सदा पत्युर्हिति रता ॥५॥ देवानामपि साराध्या मुनीनां ब्रह्मवादिनाम्। धवस्यैकस्य या नारी लोके पूज्यतमा स्मृता ॥६॥ तस्या संमानने गुर्वी निभृता न भविष्यति । मध्यदेशे पुरा तात नगरी चातिशोभना॥७॥ तस्यां च ब्रह्मजातीया सैव्या नाम्नी पतिव्रता । तस्या धवोऽभवत्कुष्ठी पूर्वकर्मविरोधतः॥८॥ गलद्ब्रणस्य पत्युश्च नित्यं चर्या परायणा । यद्यन्मनोरथं तस्य शक्त्या सा कुरुते भृशम् ॥९॥ अर्चयेद्देववन्नित्यं स्नेहं कुर्यादमत्सरा। कदाचित्पथि गच्छतीं वेश्यां परमसुंदरीम् ॥९१०॥ दृष्ट्वातीवाभवन्मोहान्मन्मथाविष्टचेतनः । निश्श्वस्य सुतरां दीर्घ ततस्तु विमनाभवत् ॥१९॥ श्रुत्वा गृहाद्विनिः सृत्य साध्वीं पप्रच्छ तं पतिम्। पतिव्रता का महात्म्य वर्णन, पतिव्रता सैव्या द्वारा पति की सेवा का वर्णन और माण्डव्यमुनि की कथा नरोत्तम ब्राह्मण ने कहा-- हे प्रभो ! आप सभी देवताओं तथा दूसरों के स्वामी हैं । आप ही जगत् के कर्ता, जगत् का संहार करने वाले, रक्षक, स्वामी तथा जनक हें ॥१॥ हे भगवन् ! हमलोगों को कथन मात्र से श्रम होता है । किन्तु मुझे इस बात को जानने का कौतूहल, प्यास तथा भूख है । यदि कोई किसी बात को पूछता है तो प्रिय व्यक्ति को उसे बतलाना चाहिए । हे नाथ ! यह पतिव्रता हमारी बीती घटनाओं को कैसे जानती है ॥३॥ उसका प्रभाव क्या है ? इस बात को आप बतलाइयें । श्रीभगवान् ने कहा-- हे वत्स ! मैंने पहले ही उसे बतला दिया है, फिर भी तुम्हें कौतूहल है ॥४। में उन सारी बातों को कहुँगा, जो तुम्हारे मन में है । पतिव्रता को उसका पति प्राण के समान प्रिय होता है, वह सदैव पति का कल्याण करने में लगी रहती है ॥५॥ वह देवताओं तथा ब्रह्मज्ञानी मुनियों का भी प्रिय होती है जो केवल अपने पति की ही नारी होती है, वह लोक में सर्वाधिक पूज्य कही गयी है॥६॥ वह सम्मान करने से गुरुत्व सम्पन्न नहीं होती है हे तात ! मध्यदेश में एक अत्यन्त सुन्दर नगरी थी ॥७॥ उस नगरी में एक सैव्या नाम की प्रतित्रता थी । पूर्व कर्म के विपरीत होने के कारण उसका पति गलितकुष्ठ वाला हो गया।।८॥ वह गलित कुष्ठ वाले भी अपने पति की सेवा में सदैव लगी रहती थी । उसकी जो-जो इच्छा होती थी उसको वह अपनी शक्ति के अनुसार पूर्ण करती थी ॥९॥ वह अपने पति की देवता के समान पूजा करती थी और बिना किसी कपट के उससे स्नेह करती थी । एक बार उसके पति ने उस मार्ग से जाती हुयी सुन्दरी नाम की वेश्या को देखा ॥१०॥ उसको देखकर वह कामावेश से युक्त हो गया । उसने लम्बी श्वास ली और उदास हो गया ॥११॥ उसको सुनकर घर से निकलकर पतिव्रता ने अपने पति में उसकी उदासी का कारण पूछा साध्वी ने कहा-- हे नाथ!
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