Srishti Khanda Extracted Page 728

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-728

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Sanskrit Original

अकर्तव्यशतं कृत्वा पितृश्राद्धं करोति य: । सर्वपापक्षयस्तस्य स्वर्गं याति च मानव: ॥३० १॥ सर्वाभावे पितृतिथौ गोम्यो घासं सददाति यः । फलं च पिंडदानस्य सं्राप्रोत्यधिकं नरः॥३०२॥ पुरा वैराटविषये रुरोदातीव दीनकः । पितृतिथौ स्वयं प्राप्ते सर्वाभावाच्च रोदिति॥३०३॥ रुदित्वा सुचिरं सोऽपि पप्रच्छकोविदं द्विजम् । ब्रह्मनूपितृतिथावाद्य किंस्वित्कृत्वा हितं भवेत् ॥३०४॥ वराटकश्च मे नास्ति धनं ब्रह्मविदांवर । उपदेशं च मे देहि येन धर्मे स्थितो ह्यहम् ॥३०५॥ द्विज उवाच गच्छ शीघ्रं बने तात मुहूर्ते कुतपेऽधुना । घासं पितरमुद्दिश्य गवे देहीति सत्वरम् ॥३०६॥ भगवानुवाच ततस्तस्योपदेशेन गृहीत्वा घासपूलकम् । गवे दत्वा यथाहृष्टः पुष्ट्यर्थं पितुरेव च॥३०७॥ एतत्पुण्यप्रसादेन गतोऽसौ सुरमंदिरम् । स्वर्ग च सुचिरं भुक्त्वा उत्पन्नो धनिनां कुले॥३०८॥ धनवान्स पुरा पुण्यात्पितृयज्ञस्य कारणात् । स॒ ददाति पितुः पिडं सर्वस्वेन धनेन च ॥३०९॥ तत्रैक जन्मनोभ्यासाद्रतोऽसौ विष्णुमंदिरम् । भुक्त्वानन्तसुखं तत्र सार्वभौमो भवेज्रपः ॥३९०॥ पितृयज्ञात्परो यस्माद्धर्मो नास्ति कथंचन । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन शक्ताकुर्यादमत्सरः ॥३११॥ यःपठेद्धर्मसंतानं जनानामग्रतो नरः। विष्णुपद्या जले स्नानं प्रतिलोके च लभ्यते ॥३१२॥ जन्मजन्मकृतो येन महापातकसंचयः। तत्सर्वं प्रलयं याति सकृदुच्चरिते श्रुते ॥३१३॥ इति श्रीपद्ममहापुराणे प्रथमे सृष्टिखंडे पंचाख्यानो नाम पंचाशत्तमोध्यायः ॥५०॥ —— re उसके सारे पाप विनष्ट हो जाते हैं और वह स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥३०१॥ सब कुछ के अभाव में जो मनुष्य अपने पिता की तिथि पर गायों को मुट्ठी भर घास भी दे देता है तो उसे पिण्डदान करने का फल प्राप्त होता है॥ ३० २॥ प्राचीन काल में विराट देश में एक निर्धन ब्राह्मण रहता था । पिता की तिथि आने पर उसने अत्यन्त दीन होकर रोया, क्योंकि उसके पास श्राद्ध के लिए कुछ भी नहीं था ॥३०३॥ दीर्घकाल तक रोने के बाद एक विद्वान् ब्राह्मण से पूछा हे ब्रह्मज्ञानियो में श्रेष्ठ ! मेरे पास कुछ नहीं है, आज मेरे पिता की तिथि है, मैं क्या करूँ की धर्म में स्थित रहूँ ? आप मुझे उपदेश दें ॥३०४-३०५॥ ब्राह्मण ने कहा-- हे तात ! इस कुतप की बेला में शीघ्र ही वन में चले जायँ और पितरों की तृप्ति के लिए गायों को घास खिला दीजिये ॥३०६॥ श्रीभगवान् ने कहा-- उसके बाद उस विद्वान के उपदेश से घास की पूली लेकर, वह ब्राह्मण पितरों की पुष्टि के लिए गायों को प्रदान किया । उसी से उत्पन्न पुण्य के कारण वह स्वर्ग चला गया दीर्घकाल तक स्वर्ग सुख को भोगकर वह धनिक वंश में जन्म लिया ॥३०८॥ वह आपने पूर्व जन्म के तथा पितृश्राद्ध जन्य पुण्य से धनवान हुआ । वह अपने सर्वस्व तथा धन के द्वारा पिता का श्राद्ध करता था ॥३०९॥ उस एक जन्म के अभ्यास से वह वैकुण्ठ लोक में गया । वहाँ पर अनन्त भोगों को भोग कर वह सार्वभौम राजा हुआ ॥३१०॥ चूकि श्राद्ध से बढकर दूसरा कोई धर्म नहीं है अतएव अपने सम्पूर्ण प्रयासों के द्वारा मत्सररहित होकर श्राद्ध करना चाहिए ॥३११॥ जो धार्मिक सन्तान लोगों के समक्ष इस कथा को पढता है वह प्रत्येक लोक में गङ्गा स्नान का फल प्राप्त करता है ॥३१२॥ उसके प्रत्येक जन्म के पाप इस प्रसङ्ग का एक बार भी पाठ कर लेने से विनष्ट हो जाते हैं ॥३१३॥ इस तरह श्रीपद्ममहापुराण के प्रथम सृष्टिखण्ड के पञ्चाख्यान नामक पचासवें अध्याय का शिवप्रसाद द्विवेदी (श्रीधराचार्य) कृत हिन्दी अनुवाद सम्पूर्ण हुआ ।।५०।। —— re

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