Srishti Khanda Extracted Page 727
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-727
Sanskrit Original
श्रोपद्ममहापुराण भक्ष्याणि च्रितयतश्च लोकांतरमयुस्तदा । ज्ञात्वा वेदं च वेदांगं मोक्षं यास्यामहे वयम्॥२८९॥ चितयंतो गता अन्ये ततो लोकांतरं प्रति। अथ त्रयो नृपा जाताश्चत्वारो विप्रसत्तमाः ॥२९०॥ कुरुक्षेत्रे ततो वेदान्वेदांगानि समंततः । तपोबलाद्विदंतिस्म वार्ता चामुत्र चेह च ॥२९१॥ त्रयो राजकुले जाता राजानो मदमोहिताः। ज्ञानलोपात्परं लोकं न जानंति हिताहितम् ॥२९२॥ ते च विप्राश्च संदेहादाहूय चेटकं स्वकम् । विप्रा ऊचुः राज्ञो गच्छ स्वकार्पण्यात्पत्रं देहि च संभ्रमात् ॥२९३॥ सप्तव्याघादशार्णेषु मृगाः कालंजरे गिरौ । चक्रवाकाः शरद्वीपे हंसाः सरसि मानसे॥२९४॥ तेपि जाताः कुरुक्षेत्रे ब्राह्मणा वेदपारगाः । प्रस्थिता दूरमध्वानं यूयं किमवसीदथ ॥२९५॥ श्रीभगवानुवाच शृहीत्वा चेटको लेखं राज्ञस्तु समदर्शयत् । दृष्टवा लेखं तु राजानो राज्यं त्यक्त्वा ययुर्द्धिजान्॥२९६॥ श्रुत्वा वाक्यं ततस्तेषां गतास्ते च तपोधनाः । अचिरेणैव कालेन मोक्षं याताश्च तैस्सह ॥२९७॥ य इदंशृणुयाच्छाद्धे सप्तव्याधादिकं द्विज । अक्षयं चान्नपानं च पितृणामुपतिष्ठति ॥२९८॥ द्विज उवाच वित्तहीनस्य विप्रस्य पितृकार्यं कथं भवेत्। तपस्विनो वनस्थस्य गृहस्थस्य च केशव॥२९९॥ भगवानुवाच तृणकाष्ठार्जनं कृत्वा प्रार्थयित्वा वराटकम्। करोति पितृकार्याणि ततो लक्षगुणं भवेत् ॥३००॥ हुआ ॥२८७॥। अपनी पत्नियों और परिच्छदों के साथ वह राजा तीर्थ में स्नान करने के लिए गया राजा को देखकर तीन हंस अज्ञान के कारण, राज्य, भोग्यपदार्थ तथा स्त्रियों ॥२८८॥ एवं भक्ष्य पदार्थो का चिन्तन करते हुए मर गये। और दूसरे जो चार थे वे; हमलोग वेदों एवं वेदाङ्गं का ज्ञान प्राप्त करके मुक्ति प्राप्त करेंगे, इस प्रकार से सोचते हुए अपने शरीर का परित्याग किए । उसके बाद उनमें से तीन तो राजा हुए और चार श्रेष्ठ विप्र हो गये ॥२८९-२९०॥ वे कुरुक्षेत्र में रहकर अपनी तपस्या के बल से बेदों तथा वेदाङ्गों का तथा लौकिक एवं पारलौकिक वृत्तान्तों का ज्ञान प्राप्त कर लिए ॥२९१॥ तीन तो राजकुल में उत्पन्न होकर मद एव मोह से मोहित राजा हो गये । उनके ज्ञान का लोप हो गया, उनको परलोक तथा अपने कल्याण तथा अकल्याण का ज्ञान नहीं रहा ॥२९२॥ वे चारो ब्राह्मण अपने नौकर को बुलाकर कहे । ब्राह्मणों ने कहा-- तुम राजा के यहाँ जाकर अपनी दीनता के साथ यह पत्र दे देना ॥२९३॥ पत्र में लिखा था दशार्ण प्रदेश में उत्पन्न सात व्याधे मरकर कालञ्जर पर्वत पर मृग हो गये । फिर वे शरद्वीप में चक्रवाक पक्षी हुए । उसके बाद मानसरोवर में हंस हो गये ॥२९४॥ वे कुरुक्षेत्र में वेदपारंगत ब्राहण हुए! आपलोग दूर तक का मार्ग पार कर चूके हैं, तुमलोग क्यों दु:खी होते हो ॥२९५॥ श्रीभगवान् ने कहा-- चेटक उस पत्र को ले जाकर उस राजा को दिखाया उस श्लोक को देखकर वे राजा राज्य को छोड़कर उन ब्राह्मणों के पास गये ॥२९६॥ उन ब्राह्मणों की वाणी को सुनकर वे सब तपस्वी हो गये । और वे शीघ्र ही उन ब्राह्मणों के साथ मुक्त हो गये ॥२९७॥ हे द्विज ! जो व्यक्ति श्राद्ध के अवसर पर उन सातों व्याधों आदि की कथा को सुनता है, उसके द्वारा दिया गया अन्न तथा जल तिपरों को अक्षय रूप से प्राप्त होता है ॥२९८॥ ब्राह्मण ने कहा-- जो ब्राह्मण, तपस्वी, वन में रहने वाला, निर्धन, गृहस्थ है, वह श्राद्ध कैसे करे 2॥२९९॥ श्रीभगवान् ने कहा-- तृण और काष्ठ के द्वारा तथा भीख माँगकर जो कौड़ी-कोड़ी करके धनार्जन करता है; और उससे यदि वह श्राद्ध करता है तो उसका फल लाख गुना होता है ॥३००॥ सैकड़ों पापों को करके भी जो पितरों का श्राद्ध करता है,
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