Srishti Khanda Extracted Page 726
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-726
Sanskrit Original
वसिष्ठस्य मुनेः शिष्या ब्रह्माणास्सप्त सुव्रता; । पितृश्राद्े समायाते होमधेनुं गुरोः प्रियाम्॥२७५॥ प्रार्थयित्वा गृहं नीत्वा सप्तभि भ्रतिभि मुदा । गव्यार्थं पितृयज्ञे तां धेनुं हत्वा विमृश्य च॥२७६॥ ददुर्मांसं च विप्रे च शेषं विप्रांस्त्वभोजयम् । समाप्य पितृकर्माणि वत्सं संगृह्य ते द्विजाः ॥२७७॥ गुरौ समर्पयामासु धेनुव्यघ्रिण भक्षिता। ततस्तपोबलादेव ज्ञात्वा तेषां च कारणम् ॥२७८॥ स शशाप ततः शिष्यांश्रांडालाश्च भविष्यथ। वेपमानास्ततो विप्राः कृतांजलिपुटाः स्थिताः ॥२७९॥ शिष्या ऊचु धेनोर्मासं प्रदातारः पितृकृत्ये सदानघ । अकर्तव्यसहस्राणि महांति पातकानि च ॥२८०॥ कुर्वतः पितृकार्येषु पापात्पूतादिवं गताः । श्रुतं बहुविधं नाथ मुखात्ते च पुरातनम् ॥२८१॥ क्षंतु मर्हसि धर्मज्ञ शापस्यांतो विधीयताम् । वसिष्ठ उवाच शापो वोऽथ यथापाप्मा न तु धर्मविचारणात् ॥२८२॥ चांडालादौ समुत्पन्नाः पुरावृत्तं स्मरिष्यथ। न च वो ज्ञानलोपश्च स्मृतिशास्त्रमनष्टकम् ॥२८३॥ पापयोनिं समुत्तीर्य पश्चात्मोक्षं गमिष्यथ । ततःप्राणान्परित्यज्य गुरुशापात्तु ते द्विजाः॥२८४॥ जाताश्चांडालयोनौ तु सर्वे ज्ञानसमन्विताः । स्तन्यं तैस्तु न पीतं वै समरद्धिः पूर्वजन्म तत्॥२८५॥ मृताजाता मृगाः सर्वे चक्रवाकाः पुन वने । हंसास्तु मानसे तीर्थे शुक्ला जाताः पुनर्डिजाः॥ २८ ६॥ मुमूर्षवो महाभागा मृतास्ते खेदकारणात्। तस्मिन् काले महाराजो धर्मकेतुरिति स्मृतः ॥२८७॥ यायौ स्त्रातुं ततस्तीर्थं सदारःसपरिच्छदः। ततो हंसासत्रयो मोहाद्राज्यं भोग्यंतु योषितः ॥२८८॥ Robson RE ORS PCRS AEDES कल कक के सात ब्राह्मण शिष्य थे, पितृश्राद्ध की बेला में अपने गुरु की प्रिय होमधेनु को ॥२७५॥ प्रार्थना करके प्रसन्नता पूर्वक अपने घर लाये । गौ गव्य के लिए लाये थे, उन सबों ने विचार करके उस गौ को मार दिया ॥२७६॥ उसके मांस को ब्राह्मण को परस दिया और उसे ही खिला दिया । श्राद्ध पूरा करके उन सबों ने केवल बछड़े को ले जाकर महर्षि को सौंप दिया ।॥२७७॥ गुरु को समर्पित करके उन सबों ने कहा कि गौ को बाघ मार कर खा गया । उसके बाद तपस्या के बल से महर्षि उन सबों के कार्य को जान गये ॥२७८॥ उन्होंने शिष्यों को शाप दे दिया कि तुमलोग चाण्डाल हो जाओगे । उसके बाद वे सब काँपते हुए महर्षि के सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये और कहे---।॥।२७९॥ हे अनध ! पितृकार्यं में गोमांस भी प्रदान करने वाले तथा हजारों महान् पाप करने वाले भी॥२८०॥ श्राद्ध करने के कारण पाप से पवित्र हो गये और स्वर्ग लोक चले गये ऐसी बहुत सी पुरानी कथायें सुनी गयी हैं ॥२८ १॥ हे धर्मज्ञ आप हमलोगों को क्षमा कर दें और पाप का अंत कर दें । वसिष्ठ महर्षि ने कहा-- तुमलोगों को धर्म का विचार नहीं करने के कारण पाप के अनुसार शाप लगेगा ॥२८२॥ तुमलोग पहले चाण्डाल योनि में उत्पन्न होकर भी अपने पूर्वजन्म के कार्यों का स्मरण करोगे । तुमलोगों का ज्ञान लुप्त नहीं होगा । अतएव स्मृति और शास्त्रों का ज्ञान बना रहेगा ॥२८३॥ पाप योनि को पूरा करके तुमलोग मोक्ष को प्राप्त कर लोगे । उसके बाद प्राणों का परित्याग करके वे ब्राह्मण, चाण्डाल योनि में उत्पन्न हो गये, किन्तु उनके ज्ञान का लोप नहीं हुआ । वे अपने पूर्व जन्म के वृत्तान्त का स्मरण करके अपनी माता का स्तन पान नहीं किए ॥२८४-२८५॥ इसके कारण मरकर वे वन में मृग हो गये, उसक बाद वे सब चक्रवाक पक्षी हो गये । उसके बाद वे मानसरोवर में जाकर श्वेत वर्ण के हंस हो गये ॥२८६॥ मुमूर्षु वे सब शोक करते हुए मर गये । उस समय प्रख्यात राजा धर्मकेतु
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