Srishti Khanda Extracted Page 725

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-725

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Sanskrit Original

कक श्रीपद्ममहापुराण सर्वोपकरणैस्तुल्यं धरादिगजवाजिकम् । कृष्णां गां च प्रदद्यात्तु सर्वपापविमुक्तये ॥२६२॥ चतुथहि त्रिपक्षे च षण्मासे चाब्दिके तथा । द्वादशप्रतिमास्यानि श्राद्धान्येतानि पोडश ॥२६३॥ यस्यैतानि न संतीह यथाशक्ति च श्रद्धया । पिशाचत्वं स्थिरं तस्य दत्तैः श्राब्दशतैरपि॥२६४॥ अब्दमंबुघटं दद्यादन्नंचामिषसंयुतम् । नित्यानित्यमभावाच्च क्षपन्मासं समापयेत् ॥२६५॥ सपिंडीकरणश्राद्धं गते संवत्सरे बुधः । पार्वणस्य विधानेन कारयेदिद्टजसत्तमः ॥२६६। पितुरब्दमशौचं स्यान्मातुः षण्मासमेव च। त्रिमासंतुस्त्रियश्चैव तदर्व्टभ्रातृपुत्रयोः॥ २६७॥ सपिंडानामशौचं स्याद्यावद्नेहे स तिष्ठति । पुत्रस्य यन्निषिद्धं तु श्ृणु तात बदाम्यहम् ॥२६८॥ ब्रह्मचारी सदाचारी नगच्छेच्च स्त्रियं क्वचित् । सप्तघट्याः परं चैव नवघट्याश्च पूर्वतः ॥२६९॥ सकालःकुतपो ज्ञेयः पितृणां दत्तमक्षयम्। श्राद्धे त्रीणि पवित्राणि दौहित्रं कुतपास्तिलाः ॥२७०॥ त्रीणि चात्र प्रशंसंति सत्यमक्रोधमत्वराम्। सायं संध्यां परान्नं च पुनर्भोजनमैथुनम् ॥२७१॥ दानं प्रतिग्रहं चैव श्राद्धं कृत्वा विवर्जयेत्। अकर्तव्यशतं कृत्वा श्राद्धं कुर्याद्विचक्षणः ॥२७२॥ तच्च कर्तव्यतामेति स्वयमुक्तं विरिंचिना। श्रृणु पुत्र पुरावृत्तं बहूनां च वदाम्यहम् ॥२७३॥ गुरोर्गोहननं कृत्वा ददुः श्राद्धं ययुर्दिवम् । तेषां चकीर्तनादेव श्राद्धं भवति चाक्षयम् ॥२७४॥ दिन श्राद्ध करे ॥२६०॥ प्रेत के शरीर की पुष्टि के लिए एक ब्राह्मण को भोजन कराये । ब्राह्मण को विधिपूर्वक वस्र चौकी, चरणपादुका इत्यादि का दान करे ॥२६१॥ सभी उपकरणों के साथ पृथिवी, हाथी ओर घोड़े आदि का दान करना चाहिए । सभी पापों से मुक्ति पाने के लिए काली गो का दान करे ॥२६२॥ चतुर्थाह (दाह के चौथे दिन किए जाने वाले श्राद्ध) त्रैपाक्षिक (तीन पक्ष के बाद किया जाने वाला श्राद्ध) छह मास के भीतर किया जाने वाला श्राद्ध (षाण्मासिक) वर्ष के भीतर किया जाने वाला श्राद्ध (उनवार्षिक) इनसे भिन्न बारह मासों में किए जाने वाले बारह श्राद्ध इसतरह से सब मिलकर किये जाने वाले सोलह श्राद्ध होते हैं ॥२६२-२६३॥ जिन मनुष्यों के ये सोलह श्राद्ध नहीं किए जाते है, उसकी पिशाचत्व से मुक्ति सैकड़ों श्राद्ध करने पर भी नहीं होती है ॥ २६४॥। एक वर्ष तक प्रेतात्मा को घड़ा में भरकर पानी तथा अन्न एक वर्ष तक देना चाहिये । ऐसा प्रतिदिन नहीं कर सकने पर पक्ष तथा मास भर पर क्षमा माँगे ॥२६५॥ एक वर्ष पूरा हो जाने पर विद्वान् को चाहिए कि वह पार्वण विधि से प्रेतात्मा का सपिण्डीकरण श्राद्ध कर दे ॥२६६॥ पिता का अशौच एक वर्ष तक रहता है, माता का छह मास तक, खत्री का अशौच तीन मास तक और भाई तथा पुत्र का अशौच डेढमास तक रहता है ।।२६७।। जब तक प्रेतात्मा का शव घर में रहता है तब तक ही सगोत्रीयों को अशौच होता है । हे तात ! जिन कार्यो को नहीं करना चाहिए उसे मैं बतला रहा हूँ सुनो ॥२६८॥ उसे ब्रह्मचर्य तथा सदाचार का पालन करना चाहिए वह खी के पास न जाय । दिन के पहले की सात घड़ी और बाद के नव घड़ी का जो काल है, वह कुतप कहलाता है । कुतप की वेला में पितरों के लिए किया गया श्राद्ध अक्षय होता है । श्राद्ध में तीन वस्तुएँ पवित्र होते है दौहित्र (लड़की का लड़का), कुतप और तिल।।२६९-२७०॥ श्राद्ध में तीन बातें प्रशंसित है सत्य, अक्रोध और शीघ्रता न करना । श्राद्ध करने वाले कीसायं सन्ध्या, दूसरे के यहाँ का भोजन, मैथुन, दान लेना ये सब कार्य नहीं करना चाहिए । सैकड़ों पापों को करके भी श्राद्ध करना चाहिए ॥२७२॥ श्राद्ध के लिए किया गया सारा पाप भी कर्तव्य बन जाता है, यह ब्रह्माजी ने कहा है । हे पुत्र ! सुनों मैं इस विषय में प्राचीन इतिहास बतला रहा हूँ ॥२७३॥ गुरु के गाय को मारकर जिन लोगों ने श्राद्ध किया वे स्वर्ग प्राप्त किए । उन सबों का नाम लेने मात्र से श्राद्ध अक्षय हो जाता है ॥२७४॥ महर्षि वसिष्ठ

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