Srishti Khanda Extracted Page 723

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-723

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Sanskrit Original

समुपोष्य तयोः पूर्वे पुण्यतीर्थे तु य: पुमान् । दत्वापिंडोदकं दानं सत्यलोके प्रतिष्ठितः ॥२३४॥ द्विज उवाच पितुरेव महायज्ञः श्राद्धं च भवतेरितम् । तातापश्चिमकालादौ किंकर्त्तव्यं सुतेन हि ॥२३५॥ किं कृत्वा च परं श्रेयो जन्मजन्मसु लभ्यते । पुत्रेण धीमता देव यत्नतो वक्तुमर्हसि॥२३६॥ श्रीभगवानुवाच पूर्वे वयसि संप्राप्ते पिता पुत्र इति स्मृतः । उत्तरे च सुतस्तातः पालनान्नतु पूजनात् ॥२३७॥ देववत्पूजयेत्तातं, स्नेहं कुर्याच्च पुत्रवत्। न लंघयेट्ठचस्तस्य मनसापि कदाचन ॥२३८॥ आतुरस्य पितुः पुत्रो यस्तु कुर्यात्प्रतिकियाम्। सोऽ क्षयं लभते स्वर्ग सदा देवैः प्रपूज्यते ॥२३९॥ मुमूर्षोरपि तातस्य पश्यतो मृत्युलक्षणम् । कृत्वा च यजनं पुत्रो देवानां तुल्यतां व्रजेत्॥२४०॥ विधिनाऽनशनेनेव पितुःस्वर्गं ददाति य: । पुत्रस्य तस्य धीरस्य शृणु वक्ष्यामि यह्ुणम् ॥२४९॥ अश्वमेधसहस्राणि राजसूयशतानि च। भवेदनशने पुण्यं तीर्थकोटिगुणं तयोः ॥२४२॥ भागीरथ्या जले चैव यो मृतः पुरुषोत्तमः । पयोधररसं मातुर्नपिबेन्मुक्ततां ब्रजेत्॥२४३॥ वाराणस्यां त्यजेद्यस्तु प्राणांश्चैव यदृच्छया । अभीष्टं च फलं भुक्त्वा मद्देहे प्रविलीयते॥२४४॥ या गतिरयोगयुक्तानां मुनीनामूर्ध्वरेतसाम्। सा गतिस्त्यजतः प्राणान् ब्रह्मपुत्रेषु सप्तसु ॥२४५॥ लोहितस्य विशेषेण तीरोत्तरसमाश्रितः । विधिना यस्त्यजेत्प्राणान्स च मत्समतां व्रजेत् ॥२४६॥ तस्यैव चोर्वशीकेशे पुण्यतीर्थे द्विजोत्तम । मृतोत्पन्नः समाप्नोति सर्वदोषैर्न लिप्यते ॥२४७॥ है ॥२३२॥ सूर्यबार को जब सूर्य ग्रहण लगे और सोमवार को चन्द्रग्रहण लगे तो चूड़ामणि योग होता है, उसका अनन्त फल बतलाया गया है ॥२३३॥ उन दोनों अवसर पर पहले उपवास करके व्यक्ति पवित्र तीर्थ में तर्पण करके तथा श्राद्ध करके सत्यलोक में जाता है ॥२३४॥ ब्राह्मण ने कहा-- आपने पिता के लिए किए जाने वाले श्राद्ध को महायज्ञ कहा गया है, किन्तु आप यह बतलाइये कि पुत्र को पिता के जीवित रहने पर उनके लिए क्या करना चाहिए॥२३५॥ बुद्धिमान पुत्र क्या करे कि उसको प्रत्येक जन्मों में परंकल्याण की प्राप्ति हो आप बतलाइये। २३६॥ श्रीभगवान् ने कहा-- बाल्यावस्था में पिता ही पुत्र कहलाता है । उसके बाद की अवस्था में पुत्र पालन करने के कारण पिता कहलाता है, पूजन करने के कारण नहीं ॥२३७॥ पुत्र को चाहिये कि वह पिता की देवता की समान पूजा करे और तथा पुत्र के समान उनसे स्नेह करे । उनकी आज्ञा का कभी मन से भी उल्लंघन न करे ॥२३७-२३८॥ जो पुत्र अपने रोगी पिता की दवा कराता है, वह अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है और वहाँ पर देवता उसकी पूजा करते हैं ॥२३९॥ मरणासन्न तथा मृत्यु के लक्षण से युक्त पिता की भी पूजा करने वाला पुत्र देवता के समान हो जाता है ॥२४०॥ जो पुत्र पिता की सद्रति की प्राप्ति के लिए विधिपूर्वक उपवास करता है, उससे उसको जिस फल की प्राप्ति होती है उसे मैं बतलाता हूँ ॥२४१॥ उस उपवास का फल हजारों अश्वमेध तथा सैकड़ों राजसूय यज्ञ के फल के समान तथा करोड़ों तीर्थो में स्नान के फल के समान होता है ॥२४२॥ जो मनुष्य गङ्गा जल में जाकर अपना प्राण त्याग करता है वह मुक्त हो जाता है, पुन: जन्म नहीं लेता है ॥२४३॥ जिसके प्राण वाराणसी में निकल जाय, वह अपने अभिप्रेत भोगों को प्राप्त करके मेरे शरीर में विलीन हो जाता है ॥२४४॥ जो गति ऊर्ध्वरेतस् योगियों को मिलती है, वह गति सात ब्रह्मपुत्रो (ब्रह्मपुत्र नदी की धाराओं) में प्राण त्याग करने वाले की होती है ॥२४५॥ विशेष रूप से लोहित के उत्तर तट पर अपने प्राणों का जो विधिपूर्वक परित्याग करता है वह मेरे समान हो जाता

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