Srishti Khanda Extracted Page 722
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-722
Sanskrit Original
पुनःस्वभवनं यांति शापं दत्वा सुदारुणम्। पितृशापेन पुत्रस्य नष्टं सर्वमिति स्मृतम् ॥२२०॥ धनं पुत्रा यशः काम्यमभीौष्टमायुरेव च । सर्वाण्येतानि लभ्यंते जन्मजन्मसु मानवैः ॥२२९॥ पितृणां च वरेणैव तस्मान्मैनं परिज्यजेत् । विवाहब्रतयज्ञादौ कृत्वानांदीमुखं द्विजः ॥२२२॥ अक्षयं लभते पुण्यं गोत्रं तस्य प्रवर्द्धती। एतद्दिपर्ययो यस्य स याति नरकं नरः ॥२२३॥ कुलक्षयो भवेत्तस्य सजीवो दुःखितो भवेत् । ततस्तु पूजयेदग्रे गणेशं शंभुनंदंनम्॥२२४॥ परं षोडशमातृश्च॒ तत्पश्चात्पितृसंचयम्। नांदीमुखेषु सर्वेषु प्रपितामहपूर्वकम् ॥२२५॥ नांदीमुखे द्विजान्सर्वान् स्थापयेत्ाङमुखान्सुधीः । उच्चारयेन्नमो वाक्यं स्वधाचान्यत्रयोजयेत्॥२२६॥ ग्रहणे चंद्रसूर्यस्य दत्वा पिंडोदकं नरः । अक्षयं लभते स्वर्ग पितृणां पुष्टिवर््नम् ॥२२७॥ तत्र स्नानं न कुर्याद्यः शक्त्यापिंडोदकं नरः । न ददाति पितृणां तु चांडालत्वं स गच्छति ॥२२८॥ सर्वभूमिसमं दानं सर्वे व्याससमा द्विजाः । सर्वगङ्गासमं तोयं राहुग्रस्ते निशाकरे ॥२२९॥ इंदोर्लक्षगुणं प्रोक्तं दशलक्षं तुं भास्करे। गङ्गातोये तु सम्प्राप्त इंदोः कोटी रवेर्दश ॥२३०॥ गवांशतसहस्रस्य सम्यग्दत्तस्य यत्फलम् । तत्फलं जाह्ववीस्नानो राहुग्रस्ते निशाकरे ॥२३९॥ चंद्रसूर्यम्रहेचैव अवगाहति जाह्नवीम् । सस्नातस्सर्वतीर्थेषु किमर्थमटते महीम् ॥२३२॥ सूर्यग्रहः सूर्यवारे सोमेसोमग्रहस्तथा । चूडामणिरितिख्यातस्तत्रानंतफलं स्मृतम्॥२३३॥ यदि कृष्ण पक्ष न आया हो तो तुला राशि के सूर्य में भी श्राद्ध किया जा सकता है । उस समय श्राद्ध नहीं करने पर वृश्चिक राशि की अमावस्या के आने पर पितृगण निराश हो जाते हैं ॥२१९॥ वे अपने पुत्रों आदि को भयङ्कर शाप देकर अपने भवन में चले जाते हैं । पितरों के शाप से पुत्रों का सर्वस्व नाश हो जाता है ॥२२०॥ मनुष्य प्रत्येक जन्मों में धन, पुत्र, यश सभी काम्य पदार्थ तथा अभीष्ट आयु को ॥२२१॥ पितृगणों के आशीर्वाद से ही प्राप्त करता है, अतएव पितरों का परित्याग नहीं करना चाहिए विवाह, ब्रत तथा यज्ञ आदि के प्रारम्भ में नांदीमुख श्राद्ध करके द्विज ॥२२२॥ अक्षय भोगों को प्राप्त करता है तथा उसके वंश की वृद्धि होती हे जो मनुष्य इन सभी अवसरों पर नान्दी श्राद्ध नहीं करता है वह नरक गामी होता है ॥२२३॥ उसके वंश का विनाश हो जाता है और वह जीवन भर दुःखी रहता है । इसीलिए इन सभी अवसरों पर शम्भुनन्दन गणेशजी की पूजा करे ॥२२४। उसके बाद षोडश मातृकाओं की पूजा करके पितरों की पूजा करे । सभी नांदीमुखों में प्रपितामह पूर्वक सभी ब्राह्मणों को पूर्वाभिमुख होकर स्थापित करे । सभी वाक्यों में नम: पद का उच्चारण करे अन्यत्र सर्वत्र स्वधा पद का प्रयोग करे ॥२२५-२२६॥ सूर्य और चन्द्र ग्रहण के समय तर्पण और श्राद्ध करके मनुष्य पुष्टिवद्धक अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है ॥२२७॥ जो मनुष्य इस अवसर पर न तो स्नान करता है और न तो शक्ति के अनुसार तर्पण और पिण्डदान करता है और न तो पितरों को दान करता है, वह चाण्डाल हो जाता है ॥२२८॥ चन्द्रभ्रहण के समय किये गये सभी दान भूमि दान के समान होते हैं सभी ब्राह्मण व्यासजी के समान होते हैं, सभी जल गङ्गाजल के समान हो जाते हैं चन्द्रग्रहण के समय किए गये दान का फल लाख गुना होता है और सूर्य ग्रहण के समय किया गया श्राद्ध का फल दश लाख गुना होता है । उस समय यदि गङ्गाजल मिल जाय तो चन्द्रग्रहण के अवसर पर किये गये श्राद्ध का फल करोड़ गुना और सूर्य ग्रहण के समय दश करोड़ गुना हो जाता है ॥२२९-२३०॥ एक लाख गौओं के दान का जो फल होता है उसी के समान चन््रग्रहण के समय गङ्गा में स्नान करने का फल होता है ॥२३१॥ सूर्य ग्रहण और चन्द्रग्रहण के समय जो गङ्गा में स्नान करता है, उसने सभी तीर्थो में स्नान कर लिया, उसके लिए तीर्थ यात्रा करना व्यर्थ
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