Srishti Khanda Extracted Page 721
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-721
Sanskrit Original
जातिस्मरत्वं प्राप्रोति पितृभक्ति फलं लभेत् । श्राद्धात्पो महायज्ञस्त्रेलोक्ये तु न विद्यते ॥२०५॥ अत्र यद्दीयते किंचित्सर्व चाक्षयमश्नुते । अन्यस्मिश्चायुतं विद्ध ज्ञातिभ्यो लक्षमुच्यते ॥२०६॥ पिण्डे कोटिगुणं प्रोक्तं द्विजायानन्तमुच्यते । गङ्गाजले गयायां च प्रयागे पुष्करे तथा॥२०७॥ वाराणस्यां सिद्धकुंडे गङ्गासागरसंगमे । अन्नपिंडं प्रदद्याद्यस्तस्य मुक्तिर्भवेद् ध्रुवम् ॥२०८॥ पितरश्चाक्षयं स्वर्गं लभंते जन्मनः फलम् । भागीरथ्यां विशेषेण यस्तु दद्यात्तिलोदकम् ॥२०९॥ मुक्तिमार्ग स चाप्नोति पिंडदाने तु किं पुनः । नदीतीरेषु साहस्रं नदेत्वयुतमिष्यते ॥२१०॥ सामान्यफलसंसर्गाच्छाद्धं शतगुणं भवेत् । अमायां च युगाद्यायां ग्रहणे सूर्यचंद्रयोः ॥२९१॥ पार्वणं कुरुते यस्तु सोऽक्षयं लोकमश्नुते । पितरस्तस्य तुष्यंति सर्वे समायुतं प्रति ॥२९२॥ आशिषं दयितं दत्वा भोग्यं चानंतमात्मजे। ततःपर्वणि पुत्रैश्च कर्त्तव्यं पार्वणं मुदा॥२१३॥ पित्रोर्यज्ञमिमं कृत्वा मुच्यते जन्मबंधनात्। अहन्यहनि यच्छाद्धं नित्यश्राद्धमितिस्मृतम् ॥२१४॥ श्रद्धयाकारयेद्यास्तु सोऽक्षयं लोकमश्नुते । तथैवापरपक्षे च काम्यश्राद्धं विधानतः ॥२१५॥ कृत्वा कामं स चाप्नोति यद्वा मनसि वर्तते। आषाढीमवधिं कृत्वा यस्तुपक्षस्तु पंचमः ॥२१६॥ तत्र श्राद्धं प्रकुर्वीत कन्यां गच्छतु वा न वा। कन्यां गते सवितरि यान्यहानि तु षोडश॥२९७॥ क्रतुभिस्तानि तुल्यानि समाप्तवरदक्षिणैः । काम्यश्राद्धं महापुण्यमिदंतस्यागतं शिवम् ॥२१८॥ अभावात्कृष्णपक्षादौ तुलायां कर्तुमर्हति । अमावृश्चिकमायाति नैराश्यं पितरो गताः ॥२१९॥ प्राप्त करता है । त्रैलोक्य में श्राद्ध से बढकर दूसरा कोई यज्ञ नहीं हैं ॥२०५॥ इस लोक में जो कुछ भी पितरों के लिए दिया जाता है, वह अक्षय हो जाता है । दूसरों को दिया हुआ दान दश हजार गुना होता है और ज्ञातियो को दिया गया दान लाख गुना फलप्रद होता है ॥२०६॥ पिण्डदान में लगाया हुआ धन करोड़ गुणा होता है, ब्राह्मण को दिया गया दान अनन्त गुणा होता है जो गङ्गाजी के जल में, गया में, प्रयाग में, पुष्कर में, वाराणसी में, सिद्धकुण्ड में या गङ्गा सागर संगम स्थल पर अन्न का पिण्डदान करता है, उसकी मुक्ति अवश्य होती है ॥२०७-२०८॥ पितृगण भी अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करते हैं और उनका जन्म सफल हो जाता है । विशेष रूप में जो व्यक्ति तिल मिश्रित जल से तर्पण करता है ॥२०९॥ वह मुक्ति के मार्ग को प्राप्त कर लेता और पिण्डदान करने पर कया कहना है ? नदी के तट पर हजार गुना और नद के तट पर दश हजार गुना फल होता है ॥।२१०॥। सामान्य फल के संसर्ग से श्राद्ध का महत्त्व सौ गुना हो जाता है । अमावस्या तथा युगादि तिथियों पर एवं सूर्य एवं चन्द्र ग्रहण के समय जो पार्वण श्राद्ध करता है वह अक्षय लोक में जाता है । उसके पितृगण दश हजार वर्ष पर्यन्त तृप्त रहते हैं॥२११-२१२॥ वे श्राद्ध करने वाले को प्रिय आशीर्वाद तथा अनन्त भोग प्रदान करते हैं । इसीलिए पुत्रों को चाहिए कि वे अपने पितरों का श्राद्ध प्रत्येक वर्ष करें ॥२१३॥ श्राद्ध रूपी पितृयज्ञ करके मनुष्य जन्म के बन्धन से मुक्त हो जाता है । प्रतिदिन किया जाने वाला श्राद्ध नित्य श्राद्ध कहलाता है ।।२१४॥ जो श्रद्धा पूर्वक श्राद्ध करवाता है उसका अक्षय फल होता है । उसी तरह से अपरपक्ष (कृष्णपक्ष) में श्रद्धा पूर्वक काम्य श्राद्ध का अनुष्ठान करके।।२१५।। मनुष्य अपनी सारी कामनाओं को पूर्ण कर लेता है । आषाढमास की पूर्णिमा के बाद जो पाँचवाँ पक्ष होता है ॥२१६॥ उसमें श्राद्ध अवश्य करना चाहिए जब सूर्य कन्या राशिपर नही गये हों तो भी सूर्य के कन्या राशि पर जाने पर जो सोलह दिन होते हैं ॥२१७॥ उस समय किया गया श्राद्ध श्रेष्ठ दक्षिणाओं से युक्त यज्ञ का महत्त्व रखते हैं, काम्य श्राद्ध अत्यन्त पुण्यमय होता है । इससे श्राद्ध करने वाले का अत्यन्त कल्याण होता है ॥२१८॥
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