Srishti Khanda Extracted Page 719

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-719

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Sanskrit Original

नंदंति बांधवा मेऽद्य त्वत्प्रसादाज्जनार्दन । इदानी च प्रसिद्धा मे सर्वे चैव मनोरथा:॥९७८॥ किंतु मे विस्मयो नाथ मूकादिज्ञानिनो भृशम्। कथं जानंति मदृत्तं देशांतरमुपस्थितम् ॥१७९॥ तस्य गेहोदराकाशे स्थितो ब्रिप्रोति शोभनः । तथा पतिव्रता गेहे तुलाधारशिरस्यपि॥१८०॥ तथामित्राद्रोहकस्य त्वं च वैष्णवमंदिरे। अनुग्रहाच्च मे विप्र तत्वतो वक्तुमर्हसि॥९८९॥ श्रीभगवानुवाच पित्रोर्भक्तः सदा मूकः पतिव्रता शुभा च सा। सत्यवादी तुलाधारः समः सर्वजनेषु च॥९८२॥ लोभकामजिदद्रोहोमद्धक्तोवैष्णवः स्मृतः । संप्रीतोऽहं गुणैरेषां तिष्ठाम्यावसथे मुदा ॥९८३॥ भारतीकमलाभ्यां च सहितो द्विजसत्तम । विप्र उवाच महापातकिसंसर्गान्नराश्चैवातिपातकाः ॥९८४॥ इति जल्पंति धर्मज्ञाः स्मृतिशास्त्रेषु सर्वदा । पुराणागमवेदेषु कथं त्वं तिष्ठसे गृहे ॥१८५॥ श्रीभगवानुवाच कल्याणानां च सर्वेषां कर्त्ता मूको जगत्रये । वृत्तस्थो योऽपि चण्डलस्तंदेवा ब्राह्मणं विदुः॥९८६॥ मूकस्य सदूशो नास्ति लोकेषु पुण्यकर्मतः । पित्रो भक्ति परे नित्यं जितं तेन जगत्त्रयम् ॥१८७॥ तयोर्भत्तत्या त्वहं तुष्टः सर्वदेवगणैः सह । तिष्ठामि द्विजरूपेण तस्य गेहोदरे च खे ॥९८८॥ तथा पतिब्रतागेहे तुलाधारस्य मंदिरे। अद्रोहकस्य भवने वैष्णवस्य च वेश्मनि॥९८९॥ सदा तिष्ठामि धर्मज्ञ मुहूर्त नत्यजाम्यहम् । तेन पश्यंति मां नित्यं ये त्वन्ये पापकृज्जनाः॥९९०॥ पुण्यत्वाच्च त्वया दृष्टो ममानुग्रहकारणात् । पित्रोर्भक्तिपरः शुद्धश्चांडालो देवतां गतः ॥९१९९॥ आनन्दानुभव कर रहे हैं, आज मेरे सारे मनोरथ सफल हो गये ॥१७८॥ किन्तु हे नाथ ! मुझे मूक आदि के विषय में अत्यन्त आश्चर्य है कि देशान्तर में घटित मेरे वृत्तान्त को वे कैसे जानते हें ?।।१७९॥ हे विप्र ! आप अत्यन्त सुन्दर रीति से उन सबों के घर में स्थित हें । उसी तरह से पतिव्रता के घर में तथा तुलाधार के भी घर में आप स्थित हैं ॥१८०॥ उसी तरह से आप मित्र अद्रोहक के तथा श्रीवैष्णव के घर में स्थित हैं । कृपया मुझ पर आप कृपा करके इसे बतलाइये ॥१८ १॥ श्रीभगवान् ने कहा-- मूक सदैव अपने माता-पिता का भक्त है, शुभा पतित्रता है, तुलाधार सत्यवादी है, तथा सभी लोगों के साथ समान बुद्धि रखने वाला है ॥१८२॥। अद्रोहक लोभ और काम पर विजय पर प्राप्त किए है तथा श्रीवैष्णव हमारे भक्त हैं । अतएव इन सबों के गुणों से प्रसन्न होकर इन सबों के घर में आनन्द पूर्वक सरस्वती तथा लक्ष्मी के साथ निवास करता हूँ ब्राह्मण ने कहा-- महापातकियों के संबन्ध से मनुष्य पातकी हो जाते है, यह धर्मो के जानकारों ने धर्मशास््ों में कहा है तथा पुराणों आगमों तथा वेदों में कहा गया है तो फिर आप कैसे घरों में रहते हैं ?।१८३-१८५॥ श्रीभगवान् ने कहा-- मूक त्रैलोक्य में सभी कल्याणों को करने वाला है यद्यपि उसकी चाण्डाल की वृत्ति है किन्तु देवता उसे ब्राह्मण ही जानते हैं ॥१८६॥ मूक के समानलोकों में कोई पुण्यवान नहीं है । वह नित्य ही माता-पिता की भक्ति करता है उसने तीनों लोकों को जीत लिया हे॥१८७॥ उन दोनों की भक्ति से मैं सभी देवताओं के साथ उससे सन्तुष्ट हूँ और उसके घर में द्विज के रूप में निवास करता हूँ ॥१८८॥ उसी तरह से पतिव्रता के घर में, तुलाधार के घर में, अद्रोहक के घर में तथा श्रीवैष्णव के घर में सदैव रहता हूँ हे धर्मज्ञ ! इन सबों को मैं मुहूर्त भर भी नहीं त्यागता हुँ, इसीलिए वे सब मुझे तथा दूसरे

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