Srishti Khanda Extracted Page 718
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-718
Sanskrit Original
विप्र उवाच अस्माकं सर्वथा नाथ मानसं त्वयि तिष्ठतु। त्वदृते सर्वलोकेश कदाचिन्नतु रोचताम्॥१६७॥ माधव उवाच यस्मादेतादृशी बुद्धि: स्फुरते ते सदानध । तस्मान्मत्सदृशान् भोगान् मत्नेहे संप्रलप्स्यसे ॥९६८॥ किंतु ते पितरौ पूजा माप्नुतो न त्वयानघ । पूजयित्वा तु पितरौ पश्चाद्यास्यसि मत्तनुम् ॥१६९॥ तयोर्निश्श्वासवातेन मन्युना च भृशं पुनः । तपःक्षरति ते नित्यं तस्मात्पूजय तौ द्विज ॥९७०॥ मन्युर्निपतते यस्मिन्पुत्रे पित्रोश्च नित्यशः । तन्निरयं नाबाधेऽहं न धाता न च शङ्करः ॥१७९॥ तस्मात्त्वं पितरौ गच्छ कुरु पूजां प्रयत्मतः । ततस्त्वं हि तयोरेव प्रसादान्मेपदं व्रज ॥१७२॥ व्यास उवाच इत्युक्ते तु द्विजश्रेष्ठः पुनराह जगहुरुम्। विप्र उवाच प्रसन्नो यदि मे नाथ रूपं स्वं दर्शयाच्युत ॥१७३॥ व्यास उवाच ततो द्रिजप्रणयतः प्रसन्नहदयो वशी। रूपं स्वं दर्शयास ब्रह्मण्यो ब्रह्मकर्मणे॥९७४॥ शंखचक्रगदापद्यधारणं पुरुषोत्तमम् । कारणं सर्वलोकस्य तेजसापूरयज्जगत् ॥९७५॥ प्रणम्य दंडवद्विप्र उवाच पुनरच्युतम्। अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे चक्षुषी शिवे॥९७६॥ अद्यमे च करौ श्लाघ्यौ धन्योहं जगदीश्वर । अद्य मे पुरुषा यांति ब्रह्मलोकं सनातनम् ॥१७७॥ कृपा से ही तुम मेरा दर्शन कर पाये हो अतएव तुम्हारे मन में जो हो वह वरदान मुझसे माँगो ॥१६६॥। ब्राह्मण ने कहा-- हे नाथ ! आप में ही हमारा मन लगा रहे । हे सम्पूर्ण लोकों के स्वामिन् आपसे भिन्न वस्तु में हमारा मन न लगे ।।१६७।। भगवान् माधव ने कहा हे अनघ ! चूकि तुम्हारी बुद्धि सदैव इसीप्रकार से प्रकाशित होती है, इसलिए मेरे लोक में तुम हमारे ही समान लोगों को प्राप्त करोगे ॥१६८॥ किन्तु हे अनघ ! तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे द्वारा पूजित नहीं हो रहे हैं; अतएव तुम अपने माता-पिता की पूजा करने के बाद मेरे शरीर में लीन होओगे॥ १६९॥ उन दोनों के निःश्वास वायु और क्रोध के कारण तुम्हारी बहुत अधिक तपस्या क्षीण हो जा रही है; अतएव हे द्विज ! पहले तुम उन दोनों की पूजा करो ॥१७०॥ जिस पुत्र पर माता-पिता कस क्रोध बना रहता हे, उसको नरक जाने से न तो मैं रोक सकता हूँ न ब्रहाजी और शङ्करजी ॥१७१॥ अतएव तुम अपने माता-पिता के पास जाओ और प्रयत्न पूर्वक उन दोनों की सेवा करो । उसके बाद तुम उन दोनों की ही कृपा से मेरे लोक में आओगे॥ १७२॥ व्यासजी ने कहा-- इसतरह से कहने पर उस श्रेष्ठ द्विज ने पुन: श्रीभगवान् से कहा ब्राह्मण ने कहा-- हे नाथ ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न है तों आप मुझे अपने रूप का दर्शन कराइये ॥१७३॥ व्यासजी ने कहा-- उसके बाद उस विनयावनत ब्राह्मण को ब्रह्मण्य (ब्राह्मण प्रेमी) श्रीभगवान् ने अपने रूप का दर्शन कराया।। १७४।। शङ्ख, चक्र, गदा और पदाधारी पुरुषोत्तम सम्पूर्ण जगत् के कारण स्वरूप, अपने तेज से सम्पूर्ण जगत् को पूर्ण करने वाले ॥१७५॥ श्रीभगवान् को दण्डवत प्रणाम करके, ब्राह्मण ने पुनः कहा--- आज मेरा जन्म सफल हो गया, आज मेरे नेत्र कल्याण प्राप्त हो गये ॥१७६॥ आज मेरे हाथ प्रशंसनीय हो गये, हे जगदीश्वर ! मै धन्य हो गया हूँ । आज मेरे पूर्वज सनातन लोक में जा रहे हैं ॥१७७॥ हे जनार्दन ! आपकी कृपा से मेरे बाँधव
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