Srishti Khanda Extracted Page 717

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-717

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Sanskrit Original

अपश्यत्तं द्विजं विष्णुं तिष्ठंतं पद्गातल्पके । शिरसैव प्रबंद्याथ जग्राह चरणौ मुदा ॥१५२॥ प्रसादी भव देवेश न ज्ञातस्त्वं पुरा मया । इहामुत्र च देवेश तवाहं किंकरः प्रभो ॥१५३॥ अनुग्रहश्च मे दृष्टो भवतो मधुसूदन। रूपं ते द्रष्टुमिच्छामि यदि चास्ति कृपा मयि॥१५४॥ विष्णुरुवाच अस्ति मे त्वयि भूदेव प्रियत्वं च सदैव हि। स्नेहात्पुण्यवतामेव दर्शनं कारितं मया ॥१५५॥ दर्शनात्स्पर्शनाब््यानात्कीर्तनाद्धाषणात्तथा । सकृत्पुण्यवतामेव स्वर्गं चाक्षयमश्नुते ॥१५६॥ नित्यमेव तु संसर्गात्सर्वपापक्षयो भवेत्। भुक्त्वा सुखमनंतं च मद्देहे प्रविलीयते ॥ १ ५७॥ स्नात्वा च पुण्यतीर्थेषु दृष्ट्वा मां चैव सर्वतः। दृष्ट्वा पुण्यवतां देशान् मम देहे प्रविलीयते ॥१५८॥ कथयित्वा कथां पुण्यां लोकानामग्रतः सदा। स चैव नरशार्दूल मद्देहे प्रविलीयते ॥९५९॥ उपोष्य वासरेस्माकं श्रुत्वा मच्चरितं ध्रुवम् । रात्रौ जागरणं कृत्वा मद्देहे प्रविलीयते॥१६०॥ अत्यंतघोषणो नृत्यगीतवाद्यादिकैस्सदा। नामस्मरन् द्विजश्रेष्ठ मद्देहे प्रविलीयते ॥१६९॥ मद्धक्तस्तीर्थभूतश्च त्वमेव बकमारणात्। यत्पापं तस्य मोक्षाय सखे स्थित्वा उवाच ह॥९६२॥ गच्छ मूकं महात्मानं तीर्थ पुण्यवतां वरम् । मूकस्य दर्शनात्तात सर्वे दृष्टामहाजनाः ॥१६३॥ तेषां च दर्शनादेव तथा संभाषणान्मम । मम संपर्कभावाच्च मद्गृहं चागतो भवान् ॥१६४॥ जन्मकोटिसहस्रेभ्यो यस्य पापक्षयो भवेत् । स॒ मां पश्यति धर्मज्ञो यथा तेन प्रसन्नता ॥१६५॥ ममैवानुग्रहाद्वतस अहं _दुष्टस्त्वयानघ। तस्माद्वरं गृहाण त्वं यत्तेमनसि वर्तते॥१६६॥ ही HONEA PRP MINN SPS ह वैष्णव की उस वाणी को सुनकर उस गृह में प्रवेश करके ॥१५१॥ ब्राह्मण ने देखा कि द्विजरूपी विष्णु कमल के आसन पर बैठे हैं ब्राह्मण ने शिर झुकाकर उनकी वन्दना की और दोनों चरणों को पकड़ लिया ॥१५२॥ हे देवेश! आप प्रसन्न होइये, आपको मैंने पहले नहीं जाना । हे देव ! मैं इस लोक तथा परलोक में आपका किंकर हूँ ॥१५३॥ हे मधुसूदन ! आप मेरे ऊपर कृपा करें । यदि आपकी मुझ पर कृपा है तो आप मुझे अपना रूप दिखाइये ॥१५४॥ विष्णु भगवान् ने कहा-- हे भूदेव ! आप मेरे सदैव प्रिय हैं । स्नेह के ही कारण मैंने, आपको पुण्यवान् पुरुषों का दर्शन कराया है ॥१५५॥ मेरा एक बार भी दर्शन, स्पर्श, ध्यान, कीर्तन तथा मुझसे भाषण कर लेने से पुण्यवान पुरुषों को अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति हो जाती है ॥१५६॥ मेरे नित्य संसर्ग से सभी पापों का नाश हो जाता है। वह अनन्त सुख का भोग करके मेरे देह में विलीन हो जाता है ॥१५७॥ पवित्र तीर्थो में स्नान करके तथा सर्वत्र मेरा दर्शन करके, पुण्यवानों के देशों का दर्शन करके वह मेरे देह में विलीन हो जाता है ॥१५८॥ सभी लोकों के सामने पुण्यवानों की कथा कहकर वह मनुष्य मेरे शरीर में विलीन हो जाता है ॥१५९॥ मेरे दिन (एकादशी) को उपवास करके मेरे चरित का श्रवण करके, रात्रि में जागरण करके मनुष्य मेरे देह में विलीन हो जाता है । नृत्य गीत तथा वाद्य आदि के साथ अत्यन्त घोषणा करके मेरे नामों का स्मरण करता हुआ ब्राह्मण मेरे देह में विलीन हो जाता है।॥१६०-१६१॥ मेरी भक्ति से पवित्र हुए तुमने बगुले को मार दिया, उससे उत्पन्न पाप से तुम्हें मुक्त करने के लिए मेने तुम्हें कहा कि तुँम महात्मा मूक का दर्शन करने के लिए जाओ । हे तात ! मूक का ही दर्शन करने के कारण तुम्हें सभी महात्माओं का दर्शन हुआ ॥१६३॥ उन सबों का दर्शन करने के कारण तथा मेरे साथ बातें करने के कारण मेरे साथ सम्पर्क होने के कारण तुम मेरे घर आ सके ॥१६४॥ करोड़ो हजार जन्मों में जिसके पाप का क्षय हो जाता है, वही धर्मज्ञ मेरा दर्शन कर पाता है । उसके कारण उसकी प्रसन्नता होती है ॥१६५॥ हे वत्स ! मेरी

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