Srishti Khanda Extracted Page 716

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-716

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

बकस्य निधनं यद्वा वसन्रस्याशोषणं तथा । जानीषे चापरो यश्च कामस्तेऽस्ति हृदि स्थित: ॥९४३॥ एतच्छुत्वा तु वचनमागतो वैष्णवं प्रति । विष्णुरूपद्विजेनैव सार्द्द तेन मुदा ययौ॥९४४॥ अपश्यत्पुरुषं शुद्धं ज्वलंतं च पुरः स्थितम्। सर्वलक्षणसंपूर्ण दीप्यमानं स्वतेजसा ॥९४५॥ अब्रवीत्स च धर्मात्मा ध्यानस्थं च हरेः प्रियम्। विप्र उवाच वद नो यद्यदतृत्तंवै दूरात्त्वां चागोतोह्यहम् ॥९४६॥ वैष्णव उवाच प्रसन्नस्ते सुरश्रेष्ठो दानवारीश्वरः सदा । दृष्ट्वा त्वां च मनोऽस्माकं हष्यतीवाधुना द्विज।१४७॥ कल्याणं चातुलं तेद्य फलिष्यति मनोरथः। सुरवर्त्मनि ते नित्यं चेलं शुष्यति नान्यथा ॥९४८॥ दृष्ट्वा देवं सुरश्रेष्ठं मम गेहे हरिं स्थितम्। व्यास उवाच इत्युक्ते वैष्णवेनाथ स तु तं पुनरब्रवीत् ॥९४९॥ विप्र उवाच क्वासौ विष्णुः स्थितो नित्यं दर्शयाद्य प्रसादतः । वैष्णव उवाच अस्मिन्देवशृहे रम्ये प्रविश्य परमेश्वरम् ॥१५०॥ तं दृष्ट्वा किल्बिषाद्धोरान्मुच्यसे जन्मबंधानत्। व्यास उवाच तस्य तद्वचनं श्रुत्वा प्रविश्य सदनं प्रति ॥१५२॥ बाद उस गली में उस ब्राह्मण ने उस विप्र के साथ ही अद्रोहक को देखा । ब्राह्मण ने उससे कहा कि तुम मुझे धर्म का उपदेश करो ॥१४१॥ सज्जनाद्रोहक ने कहा-- हे धर्मज ब्राह्मण ! आप पुरुष श्रेष्ठ वैष्णव के पास जायँ । उनका दर्शन करने से आपको अभीष्ट फल की प्राप्ति होगी ॥१४२॥। बगुले की मृत्यु की बात, तथा वस्र के नहीं सुखने की बात एवं दूसरी बातें जो तुम्हारे हृदय में है, उन सारी बातों को जान जाओगे ॥१५४३॥ व्यासजी ने कहा-- इसबात को सुनकर वे ब्राह्मण उस श्रीवैष्णव के पास आये । वे विष्णुस्वरूप ब्राह्मण के साथ वहाँ प्रसन्नता पूर्वक आये ॥१४४॥ उन्होंने शुद्ध देदीप्यमान तथा सामने स्थित पुरुष को देखा । वे सभी लक्षणों से सम्पन्न तथा अपने तेज से देदीप्यमान थे ॥१४५॥ ब्राह्मण ने धर्मात्मा ध्यानस्थ तथा श्रीहरि के प्रिय श्रीवैष्णव से कहा ब्राह्मण ने कहा-- आप हमारे वृत्त को बतलायें । मैं दूर से आपके पास आया हूँ ॥१४६॥ श्रीवैष्णव ने कहा-- आपकेऊपर दानवों के शत्रु देवताओं में श्रेष्ठ श्रीभगवान् प्रसन्न हैं हे द्विज ! आपको देखकर मेरा मन प्रसन्न हो रहा है।। १४७॥ आपका अतुलनीय कल्याण होगा और आपका मनोरथ पूरा होगा । तुम्हारा वस्र आकाश में ही सूखेगा। १४८॥ मेरे गृह में विद्यमान देवताओं में श्रेष्ठ श्रीहरि का दर्शन करके तुम्हारा कल्याण होगा । व्यासजी ने कहा इस तरह से श्रीवैष्णव के कहने पर ब्राह्मण बोले । ब्राह्मण ने कहा-- वे भगवान कहाँ है ? कृपा करके आप मुझे उनका दर्शन करायें । श्रीवैष्णव ने कहा-- इस मनोहर गृह में प्रवेश करके परमेश्वर ।॥१४९-१५०॥ श्रीहरि का दर्शन करके आप सभी पापों से मुक्त होकर जन्मों के बन्धन से मुक्त हो जायेंगे । व्यासजी ने कहा-- श्री

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know