Srishti Khanda Extracted Page 715
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-715
Sanskrit Original
श्रीपद्ममहापुणण नांगमस्यानलोधाक्षीन्नच वस्त्रं न कुंतलम् । खे च देवा मुदा सर्वे साधुसाध्विति चाब्रुवन् ॥१२८॥ अपतन्पुष्पवर्षाणि तस्य मूर्ध्नि समंततः । येर्यैश्च दुष्कृतं वाक्यं गदितं तावुभौ प्रति ॥१२९॥ तेषां मुखे प्रजायंते कुष्ठानि विविधानि च । तत्रागत्य च देवाश्च वलह्वेराकृष्यतं मुदा ॥१३०॥ अपूजयन्सुपुष्पैश्च मुनयो विस्मयं गताः । सरवै मुनिवरैरेवं मनुष्यैर्विविधैस्तदा ॥१३१॥ अर्च्यते तु महातेजाः स च सर्वानपूजयत् । सज्जनाद्रोहकं नाम कृतं देवासुरैर्नृभिः ॥१३२॥ तस्य पादरजः पूता सस्यपूर्णाघरा भवत् । सुराश्चाहुश्च तं तत्र भायति संप्रगृह्यताम् ॥१३३॥ एतस्य सदृशो लोके न भूतो न भविष्यति। नास्तीति सांप्रतं पृथ्व्यां कामलोभाजितः पुमान्॥९३४॥ देवासुरमनुष्याणां रक्षसां मृगपक्षिणाम् । कीटादीनां च सर्वेषां काम एष सुदुर्जयः ॥१३५॥ कामाल्लोभात्तथा क्रोधान्नित्यं सत्वेषु जायते । संसारबंधकः कामो ह्यकामो न क्वचिद्भवेत् ॥१३६॥ अनेनैवजितं सर्व भुवनानि चतुर्दश । अमुष्य हृदये नित्यं वासुदेवो मुदा स्थितः ॥१३७॥ एवं स्पृष्ट्वाथ दृष्ट्वा तं मनुष्याः सर्वकल्मषात् । पूयंते ह्यनघाश्चैव लभंते चाक्षयांदिवम् ॥९३८॥ एवमुक्त्वा गता देवा विमानैश्च दिवं मुदा । मनुष्याः प्रययुस्तुष्टा दंपती स्वगृहं तथा ॥१३९॥ दिव्यं चक्षुस्तदा तस्य चासीद्देवान् स पश्यति। त्रैलोक्यस्य च वार्त्ता च जानाति लीलया भृशम्॥९४०॥ ततस्तस्य च बीथ्यां च दृष्टस्तेन सहैव सः। स पप्रच्छमुदा तं च धर्मोद्देशं हि तं वद॥९४१॥ सज्जनाद्रोहक उवाच गच्छ बाडवधर्मज्ञ वैष्णवं पुरुषोत्तमम् । तं च दृष्ट्वात्वभीष्टं ते सांप्रतं च फलिष्यति॥९४२॥ लगता है । आज मैं अग्न में प्रवेश कर रहा हूँ मुझे देवता और मनुष्य देखें ।१२६॥ श्रीहरि ने कहा-- इसतरह से कहकर उस महाभाग ने अग्नि में प्रवेश किया । अग्नि में प्रवेश करने पर अग्नि ने न तो उसके बालों के पुष्पों को ॥१५२७॥ न उसके आङ्गों को, न वस्रों को और न बालों को जलाया; आकाश में विद्यमान देवताओं ने उसे साधु-साधु कहा ॥१२८॥ उसके शिर पर चारो ओर से आकाश से पुष्प गिरने लगे । उन दोनों की जिन-जिन लोगों ने निन्दा की थी ॥१२९॥ उन लोगों के मुख में अनेक प्रकार के कुष्ठ हो गये । वहाँ पर आकर देवताओं ने उसे आग से बाहर निकला ॥१३०॥ आश्चर्यित होकर मुनियों ने उसकी पूजा की । सभी मुनिवरों तथा अनेक मनुष्यों के द्वारा ॥१३ १॥ उस महातेजस्वी अद्रोहक की पूजा की गयी और उसने भी सबों की पूजा की । देवताओं ने उसका नाम सज्जन अद्रोहक रखा ॥१३२॥ उसके चरणों की धूलि से पवित्र भूमि धन-धान्य से भर गयी । देवताओं ने राजकुमार से कहा कि तुम अपनी पत्नी को स्वीकार करो ॥१३३॥ इसके समान न तो कोई व्यक्ति हुआ और न होगा । उस समय पृथिवी पर कोई भी पुरुष काम और लोभ से रहित नहीं है ॥१३४॥। देवता, असुर, मनुष्य, राक्षस, मृग, पक्षी तथा कीट आदि सबों के लिए काम पर विजय प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है ॥१३५॥ काम, लोभ तथा क्रोध के ही कारण जीवों को संसार का बन्धन होता है काम कभी काम रहित नहीं होता है ॥१३६॥ इसने चौदहो भुवनों को जीत लिया है । इसके हृदय में सदैव भगवान् वासुदेव प्रसन्नता पूर्वक रहते हैं ॥१३७॥ इसको देखकर तथा स्पर्श करके मनुष्य सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं वे पवित्र होकर अक्षय स्वर्ग लोक को प्राप्त करते हैं। १३८॥ इस तरह से कहकर देवता विमान द्वारा स्वर्गलोक चले गये । सन्तुष्ट होकर सभी मनुष्य अपने घर चले गये तथा वे दोनों पति-पत्नी अपने घर चले गये ॥१३९॥ उसी समय से उसकी दिव्य दृष्टि हो गयी और उसके कारण वह देवताओं को भी देखता था । वह आसानी से त्रैलोक्य की घटनाओं को जान जाता है ॥१४०॥ उसके
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