Srishti Khanda Extracted Page 714

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-714

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Sanskrit Original

i कक अीलील न लकी लकीलव कक... छत ७": ।ै।फ।ै:ै।!फैहफहफ:: 9 ला सृष्टिखण्ड ६८९ धर्मान्ननलते सोऽपि स्वभार्यापरभार्ययोः । संस्पर्शात्स्वस्त्रियश्चास्य कामाभिलषितं मनः ॥११४॥ तस्याः संसर्गतश्चैव दुहितेव प्रमन्यते। स्तनौ तस्यास्तु पृष्टे च लगन्तौ च पुनः पुनः॥११५॥ बालकस्येव पुत्रस्य स्तनौ मातुः स मन्यते । तस्या अंगानि चांगेषु लगंति च पुनः पुनः ॥११६॥ ततो मातुस्सुतस्येव सोऽमन्यत दिने दिने । तस्य योषासुसंसर्गो निवृत्तस्त्वभवत्ततः ॥११७॥ एवं संवत्सरस्याद्धे तत्पतिश्चागतः पुरम् । अपृच्छत्तं च लोकेषु तस्या वृत्तमथोदितम् ॥११८॥ केचिद्धद्रं बोधयन्तो युवानोपि सुविस्मिताः । केचिदाहुस्त्वया दत्ता तया सार्द्द स्वपित्यसौ ॥११९॥ सतरीपुंसोरेकसंसर्गात् शांतता तु कथं भवेत्। तस्यां यस्याभिलाषोस्ति नपृष्टस्सवदेद्युवा॥१२०॥ लोकानां कुश्रुतिर्वार्ता तेन पुण्यबलाच्छुता । जनापवादमोक्षार्थ बुद्धिस्तस्याभवच्छुभा॥१ २१॥ दारूणि स्वयमाहत्याजिज्यलत्स महानलम् । एतस्मिन्नंतरे तात राजपुत्रः ् रतापवान्॥९२२॥ आगमत्तद्गृहं सद्यः सोऽपश्यत्तं च योषितम्। प्रोत्फुल्लवदनां नारीं प्रविषादगतं नरम् ॥१२३॥ अनयोर्मानसं ज्ञात्वा राजपुत्रोवदद्दचः। कि न संभाषसे मां च मित्रकं चिरमागतम् ॥१२४॥ हरिरुवाच अब्रवीत्सोपि धर्मात्मा राजपुत्रमनष्टधीः । अद्रोहक उवाच यत्कृतं दुष्करं कर्म मया त्वद्धितकारणात् ॥१२५॥ सर्व व्यर्थमहं मन्ये जनानां च प्रवादतः । अद्य वह्विमहं यास्ये प्रपश्यंतु नरास्सुराः ॥१२६॥ हरिरुवाच इत्युक्त्वा समहाभागः प्रविवेश हुताशनम् । विशतस्तस्य वह्नौ न कुसुमं चिकुरालये ॥१२७॥ सोता था ॥११३॥ वह अपनी पत्नी तथा पर पत्नी के विषय में धर्म से विचिलित नहीं होता था । जब उसका अपनी पत्नी से स्पर्श होता था तो उसमें काम की अभिलाषा होती थी ॥११४। जब उसका स्पर्श उससे होता था तो वह उसे अपनी पुत्री के समान मानता था । बार-बार उसके स्तन भी इसकी पीठ से सट जाते थे ॥११५॥ वह उसके स्तनों को उसी तरह मानता था जिस तरह कोई बालक अपनी माता के स्तनों को मानता है । उस नारी के अङ्ग भी इसके अङ्गों से सट जाते थे ॥११६। उस समय वह उसी तरह मानता था जैसे कोई बालक माता के अङ्गो को मानता है। इसतरह से उसकी स्त्रियों के प्रति काम राहित्य की भावना हो गयी ॥१५१७॥ इस तरह छह मास के बाद उस स्त्री का पति आया । उसने लोगों से अपनी पत्नी के चरित्र के विषय में पूछा ॥११८॥ कुछ युवक भी आश्चर्यित होकर उसे अच्छा बतलाये । कुछ लोगों ने कहा-- तुमने तो उसे दे ही दिया था, वह उसके साथ प्रतिदिन सोता था ॥११९॥ जब स्री और पुरुष एक साथ रहें तो वे शान्त कैसे रह सकते हैं ? जिस युवक की उसको प्राप्त करने की इच्छा न हो ऐसा कौन हो सकता है ॥१२०॥ उसने (अद्रोहक ने) अपने पुण्य की बल से लोगों की निन्दा को जान लिया । वह अपने जनापवाद को मिटाने के लिए सोचा ॥१२१॥ उसने स्वयं काष्ठों को लाया और उसमें आग लगा दी । उसी समय वह राजकुमार भी आ गया । उसने अद्रोहक और अपनी पत्नी को देखा । वह नारी प्रसन्न थी और वह पुरुष उदास था ॥१२२-१२३॥ उन दोनों के मन की बात को जानकर राजकुमार ने कहा राजकुमार ने कहा-- में तुम्हारा मित्र हूँ, दीर्घकाल के पश्चात् आया हूँ, मुझसे बातें क्यों नहीं करते हो ॥ १२४॥ अद्रोहक ने कहा-- में तुम्हारे कल्याण के लिए जो दुष्कर कार्य किया है ॥१२५॥ लोगों के इस अपवाद के कारण मुझे वह सब व्यर्थ

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