Srishti Khanda Extracted Page 712

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-712

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Sanskrit Original

अनाश्चर्यमनालस्यं तस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितम् । तेने वै देवलोकस्य नरलोकस्य सर्वश: ॥९४॥ वृत्तं जानाति धर्मज्ञस्तस्य देहे स्थितो हरिः । लोके तस्य समो नास्ति समःसत्यार्जवेषु च ॥९५॥ स च धर्ममयः साक्षात्तेनैव धारितं जगत् । द्विज उवाच ज्ञातं मे त्वत्प्रसादाच्च तुलाधारस्य कारणम् ॥९६॥ अद्रोहकस्य यद्वृत्तं तद्ब्रूहि त्वं यदीच्छसि । हरिरुवाच पुरैव राजपुत्रस्य कुलस्बीनवयौवना ॥९७॥ पत्नीव कामदेवस्य शचीव वासवस्य च । तस्य प्राणसमा भार्या सुन्दरी नाम सुन्दरी ॥९८॥ अकस्मात्पार्थिवस्यैव कार्ये गन्तुं समुद्यतः । मनसा लोचितं तेन प्राणेभ्योपि गरीयसीम् ॥९९॥ कस्मिन् स्थाने स्थापयामि यतो रक्षा भवेद् ध्रुवम् । इत्यालोच्यैव सहसा त्वागतोस्य गृहं प्रति ॥१००॥ उक्तं च तादृशं वाक्यं श्रुत्वा सविस्मयं गत: । अद्रोहक उवाच न तातस्ते नचभ्राता न चाहं तव बान्धवः ॥१०९॥ पितृमातृकुलस्यैव तस्या नहि सुहज्जनः । कथं च मद्गृहे तात स्थित्या स्वस्थो भविष्यसि॥९ ० २॥ हरिरुवाच एतस्मिन्नन्तरे तेन चोक्तं वाक्यं यथोचितम् । राजपुत्र उवाच लोके त्वत्सदृशो नास्ति धर्मज्ञो विजितेन्द्रियः ॥९०३॥ दम, धैर्य, स्थैर्य, लोभ हीनता, आश्चर्यराहित्य और आलस्य राहित्य आदि सभी गुण प्रतिष्ठित हो जाते हैं । उसी के कारण वह देवलोक तथा मनुष्य लोक के समस्त वृत्तान्तों को जान जाता है ॥९३-९४॥ उस धर्मज्ञ के शरीर में श्रीहरि का निवास होता है, संसार में समता, सत्य तथा आर्जव गुणवाला कोई नहीं है ॥९५॥ वह साक्षात् धर्म स्वरूप है । वह ही जगत् को धारण किए हुए है । द्विज ने कहा-- आपकी कृपा से मैने तुलाधार के विषय में जान लिया ॥९६॥ यदि आप चाहें तो मुझे अद्रोहक के वृत्त को बतला दें । श्रीहरि ने कहा-- पूर्वकाल में एक राजकुमार ळी पत्नी नवयौवना थी ॥९७॥ वह कामदेव की पत्नी रति के समान तथा इन्द्र की पत्नी शची के समान सुन्दरी थी । वह राजकुमार को प्राण के समान प्यारी थी, उसका नाम सुन्दरी था ॥९८। अकस्मात् उसको राजा के कार्य से बाहर जाने के लिए तैयार होना पड़ा । वह अपने मन में प्राणों से भी प्रियतमा पत्नी के विषय में सोचने लगा॥९९॥ मैं पत्नी को कहाँ रखूँ जिससे इसकी रक्षा हो सके । यह सोचकर वह सहसा अद्रोहक के पास आया॥ १० ०॥ उसने अपने मन की बात अद्रोहक को सुनाया, उसे सुनकर अद्रोहक को आश्चर्य हुआ । अद्रोहक ने कहा-- मैं न तो तुम्हारा पिता हूँ, न भाई हूँ और न तुम्हारा बन्धु हूँ ॥१०१॥ न तो तुम्हारे माता-पिता के कुल का हूँ और न तुम्हारा सुहृद् हूँ । अतएव हे तात ! मेरे घर में उसको रखकर आप कैसे निश्चिन्त रह सकते हो ?॥१०२॥ श्रीहरि ने कहा-- इस समय उसने यथोचित बातें कही । राजकुमार ने कहा-- संसार में आपके समान कोई

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