Srishti Khanda Extracted Page 711
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-711
Sanskrit Original
सर्व तेत्र च जानीषे सज्जनाद्रोहकं ब्रज। तत्र तस्योपदेशेने तव कामः फलिष्यति॥८४॥ व्यास उवाच इत्युक्त्वा तं तुलाधारः करोति क्रयविक्रयौ। विप्र उवाच तथा तात गमिष्यामि सज्जनाद्रोहकं प्रति ॥८५॥ तुलाधारसमुद्देशान्नजानामि तदालयम्। हरिरुवाच एह्यागच्छ गमिष्यामि त्वया सार्द्ध च तद्गृहम् ॥८६॥ अथ वर्त्मनि गच्छंतमुवाच ब्राह्मणो हरिम् विप्र उवाच तुलाधारे च न स्नानं न देवपितूर्पणम् ॥८७॥ मलदिग्थं च गात्रं तु सर्वं चेलमलक्षणम् । कथं जानाति मतृत्तं देशांतरसमुद्धवम् ॥८८॥ अतोमे विस्मयस्तात सर्व त्वं वद कारणम् हरिरुवाच सत्येन समभावेन जितं तेन जगत्त्रयम् ॥८९॥ तेनतृप्यंत पितरो देवा मुनिगणैः सह । भूतभव्यप्रवृत्तं च तेन जानाति धार्मिकः ॥९०॥ नास्तिसत्यात्परो धर्मो नानृतात्पातकं परम् । विशेषे समभावस्य पुरुषस्यानधस्य च॥९१॥ अरौ मित्रेप्युदासीने मनोयस्य समं ब्रजेत् । सर्वपापक्षयस्तस्य विष्णुसायुज्यतां ब्रजेत् ॥९२॥एवं यो वर्तते नित्यं कुलकोटि समुद्धरेत् । सत्यं दमः शमश्चैव धैर्यं स्थैर्यमलोभता ॥९३॥ लिए धर्माकर के पास जाइये । वहाँ जाने से आपको बगुले के मरने से हुए पाप और आकाश में वस्न न सूखने की सारी बाते ज्ञात हो जायेंगी ॥८३॥ अतएव आप अद्रोहक सज्जन के पास जाइये । वहाँ पर उसके उपदेश से आपका काम पूरा हो जायेगा ॥८४॥ व्यासजी ने कहा-- इसतरह से कहकर तुलाधार अपने क्रय-विक्रय के काम में लग गये । विप्र ने कहा-- हे तात ! मैं सज्जन अद्रोहक के पास जाऊँगा ॥८५॥ तुलाधार ने मुझे वहीं जाने को कहा है, किन्तु मैं उसका घर नही जानता हूँ । श्रीहरि ने कहा-- आओ मैं तुम्हारे साथ उसके घर जाऊंगा ॥८६॥ उसके बाद रास्तें में चलते हुए श्रीहरि से ब्राह्मण ने पूछा ब्राह्मण ने कहा-- तुलाधार न तो स्नान करता है, न देवताओं की पूजा करता है, न पितरों का तर्पण करता है ॥८७।। उसके सम्पूर्ण शरीर में मैल बैठी है । उसके कपड़े गंदे हैं, फिर भी वह दूसरे स्थान में घटित मेरे वृत्तान्त को वह कैसे जानता है ॥८८॥ हे तात ! मुझको बडा आश्चर्य है, इसको आप मुझे बतलाइये । श्रीहरि ने कहा-- उसने सत्य तथा समभाव के द्वारा तीनों लोकों को जीत लिया हे॥॥८९॥ उसके कारण पितृगण, देवता और मुनिगण प्रसन्न हैं वह धार्मिक उसी के कारण भूत और भविष्य की सारी बातों को जानता है ॥९०॥ सत्य से बढकर केई धर्म नहीं है झूठ से बढकर कोई पाप नहीं होता है । खासकर निष्पाप समभाव वाले पुरुष के विषय में यह बात है ॥९ १॥ शत्रु, मित्र तथा उदासीन सबों के विषय में जिसका मन एक समान रहता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर भगवान् विष्णु के सायुज्य को प्राप्त कर लेता है ॥९२॥ जो नित्य ही इस प्रकार का आचरण करता है, वह अपने वंश के करोड़ों जीवों का उद्धार कर देता है । उसमें सत्य, शम,
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