Srishti Khanda Extracted Page 710
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-710
Sanskrit Original
हरिरुवाच ज्ञायते कारणं तात सर्वेषां भूतभावनै:। अतिपुण्यात्सदाचाराद्यतस्त्वं विस्मयं गतः ॥७३॥ किमुक्तश्च तया त्वं च वद तत्सांप्रतं मुने। विप्र उवाच प्रष्टुं घर्मतुलाधारं सा च मां समुपादिशत् ॥७४॥ हरिरुवाच आगच्छ मुनिशार्दूल अहं गच्छामि तं प्रति। गच्छतं च हरिं प्राह तुलाधारः क्व तिष्ठति ॥७५॥ हरिरुवाच जनानां निकरो यत्र बहुद्रव्यसु विक्रये। विक्रीणाति च क्रीणाति तुलाधारस्ततस्ततः ॥७६॥ जनो यवान् रसं स्नेहं कूटमन्नस्य संचयम्। सर्वतस्य मुखादेव गृह्णाति च ददात्यपि॥७७॥ सत्यं त्यक्त्वानृतं किंचित्प्राणांते समुपस्थिते । नोक्तं नरवरश्रेष्ठस्तेन धर्मतुलाधरः ॥७८॥ व्यास उवाच इत्युक्ते तु तमद्राक्षीद्विक्रीणंतं रसान्बहून्। मलपंकधरं मर्त्य॑ दंतकुड्मलपंकिलम् ॥७९॥ तत्र वस्तुधनोत्थां च भाषंतं विविधांगिरम् । वृतं बहुविधैर्मत्यैः स्त्रीभिः पुंभिश्च सर्वतः ॥८०॥ कथं कथमिति प्राह स तं मधुरया गिरा। विप्र उवाच धर्मस्य मे समुद्देशं वदप्राप्तोंऽतिकं हिते ॥८ १॥ तुलाधार उवाच यावज्जना: प्रतिष्ठंति ममैव सन्निधौ द्विज । तावन्मेस्वस्थता नास्ति यावच्च रात्रियामकः ॥८ २॥ तच्चोपदेशमादाय गच्छ धर्माकरं प्रति । बकस्य मरणे दोषं खे च वस्त्राविशोषणम् ॥८३॥ बढकर दूसरा महान् आश्चर्य क्या हो सकता है ? श्रीहरि ने कहा-- महापुरुषों के जानने के कारण हैं अत्यन्त पुण्य और सदाचार का पालन, जिसके कारण आपको आश्चर्य हो रहा है ॥७३॥ उस पतिंब्रता ने क्या कहा ? आप मुझे बतलाइये ब्राह्मण ने कहा-- उसने मुझे तुलाधार से धर्म पूछने को कहा ॥७४॥ श्रीहरि ने कहा-- हे मुनिश्रेष्ठ! आप मेरे साथ आइये में तुलाधार के घर जा रहा हूँ । जाते हुए श्रीहरि से ब्राह्मण ने पूछा कि तुलाधार कहाँ रहता है ?2॥७५॥ श्रीहरि ने कहा-- जहाँ पर बिकने वाली वस्तुओं को खरीदने के लिए लोगों की भीड़ है; उन सभी वस्तुओं को बेंचने और खरीदने का काम तुलाधार ही करता है ॥७६॥ वह अन्नो, रसों, तेलों तथा अन्य सभी वस्तुओं को लोग उसी से लेते हैं, और वह सबों को देता भी हैं ॥७७॥ प्राणांत की भी स्थिति में वह सत्य ही बोलता है झूठ नहीं बोलता है, इसीके कारण वह श्रेष्ठ मनुष्य तुलाधार कहलाता है ॥७८॥ इस तरह से कहने पर उस ब्राह्मण ने उसे वस्तुओं को बहुत से रसों को बेचते हुए देखा । उसके कपड़े मैले थे, दाँतों में मैल बैठी थी॥७९॥ वह वस्तुओं और धनों के विषय में अनेक प्रकार की बातें कर रहा था । वह अनेकों स्त्रियों से बहुत प्रकार की बातें कर रहा था ॥८०॥ किसी प्रकार से उस ब्राह्मण ने उससे मधुरवाणी में कहा ब्राह्मण ने कहा-- आप मुझे धर्म का उपदेश दें में आपके पास आया हुँ ॥८१॥ तुलाधार ने कहा-- विप्र जब तक मेरे यहाँ ग्राहक लोग हैं तब तक मैं निश्चिन्त नहीं हूँ । यह स्थिति प्रहर भर रात जाते तक रहती है ॥८२॥ आप उस उपदेश को प्राप्त करने के
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