Srishti Khanda Extracted Page 709
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-709
Sanskrit Original
हे श्रीपद्ममहापुराण तस्य पत््योऽष्टतिष्ठंति तन्मध्ये वरवर्णिनी । रूपयौवनसंपन्ना दयायुक्ता यशस्विनी॥६ ९॥ शुभानामेति विख्याता गत्वा तां पृच्छ तेहितम् । व्यास उवाच एवमुक्त्वा तु भगवांस्तत्रैवांतरधीयत ॥६ २॥ तस्यैवादृश्यतां दृष्ट्वा विस्मितोभूदिह्दजस्तदा । स च साध्वी गृहं गत्वा पप्रच्छाथ पतिब्रताम्॥६३॥ अतिथेर्वचनं श्रुत्वा गृहानिः सृत्य संभ्रमात् । दृष्ट्वा द्विजसती तत्र द्वारदेशे स्थिता भवत्॥६४॥ तां च दृष्टवा द्विजश्रेष्ठ उवाच वचनं मुदा । प्रियं मम हितं ब्रूहि यथादृष्टं त्वमेवहि ॥६५॥ पतिव्रतोवाच सांप्रतं पत्युरर्चास्ति न चास्माकं स्वतंत्रता। पश्चात्कार्यं करिष्यामि गृहाणातिथ्यमद्य वै ॥६६॥ विप्र उवाच मम देहे क्षुधानास्ति पिपासाद्य न च श्रमः। अभीष्टं वद कल्याणि नोचेच्छापं ददामि ते ॥६७॥ व्यास उवाच तमुवाच तदा सापि न बकोऽहं द्विजोत्तम । गच्छ धर्मतुलाधारं पृच्छ तं ते हितं द्विज ॥६८॥ इत्युक्त्वा सा महाभागा प्रययौ च गृहोदरम् । तत्रापश्यद्द्विजोविप्रं यथा चांडालवेश्मनि॥६९॥ विमृश्यविस्मयापन्नस्तेन सार्धं ययौ द्विजः । तिष्ठंतं च द्विजं तं च सोपश्यदधृष्टमानसम्॥७०॥ स चोवाच मुदा विप्रं दृष्ट्वा तं तां सतीं च सः । विप्र उवाच देशांतरे च यद्वृत्तं तया च कथितं किल ॥७१॥ कथं जानाति मइ्त्तं चांडालोऽपि पतिव्रता । अतो मे विस्मयस्तात किमाश्चर्यं परं महत् ॥७२॥ यौवन से सम्पन्न दयालु और यशस्विनी है ॥६१॥ वह शुभा के नाम से विख्यात है । जाकर उससे आप कल्याण की बातें पूछे । इसतरह से कहकर श्रीभगवान् अन्तर्धान हो गये ॥६१-६२।। उनके अदृश्य हो जाने पर वे ब्राह्मण आश्चर्यित हो गये । वे उस साध्वी के घर जाकर उस पतिव्रता से पूछे ॥६३॥ अतिथि की वाणी सुनकर वह पतिव्रता शीघ्रता से घर से निकली, उस ब्राह्मण को देखकर वह अपने दरवाजे पर खड़ी हो गयी ।।६४।। उसको देखकर ब्राह्मण बोले । ब्राह्मण ने कहा-- तुम मुझे कल्याणकारी बातों को बतलाओ जिसे तुम जानती हो ।॥६५।। पतिव्रता ने कहा-- इस समय मैं अपने पति की सेवा कर रही हूँ में स्वतंत्र नहीं हूँ । पति की सेवा के बाद में उसको बतलाऊंगी, आप मेरे यहाँ आतिथ्य स्वीकार करें ॥६६॥ विप्र ने कहा--- मुझे न तो भूख लगी है, न प्यास लगी है, और न तो मुझे थकान ही है । हे कल्याणि ! मेरे अभीष्ट को तुम बतलाओ नहीं तो मैं तुमको शाप दे दूँगा।६७॥ पतिव्रता ने कहा-- हे द्विजोत्तम ! मैं बगुला नहीं हूँ आप तुलाधार वैश्य के यहाँ जाइये और उससे अपने कल्याण की बातें पूछिये ॥६८॥ यह कहकर वह महाभागा घर के भीतर चली गयी । वहाँ पर उस विप्र ने वैसे ही विप्र को देखा जैसा विप्र चाण्डाल के घर में थे ॥६९॥ विचार करके आश्चर्यित वे ब्राह्मण उस विप्र के साथ चल दिये ।ब्राह्मण ने प्रसन्नता पूर्वक वहाँ पर उस विप्र को विद्यमान देखा ॥७०॥ उन विप्र तथा सती को देखकर ब्राह्मण ने विप्र से पूछा ब्राह्मण ने कहा-- दूसरे स्थान में जो घटना हुई उसको इस पतिव्रता ने बतलाया ।।७१॥ मेरे वृत्तान्त को चाण्डाल और पतिव्रता दोनों कैसे जानते हैं ? अतएव हे तात ! मुझको तो आश्चर्य हो रहा है, इससे
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