Srishti Khanda Extracted Page 707
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-707
Sanskrit Original
मूक उवाच पित्रोरर्चा करोम्यद्य कथमायामि तेंतिकम् ॥३८॥ अर्चयित्वा तु पितरौ कृत्यं तेकरवाणि वै । तिष्ठ मे द्वारदेशे च आतिथ्यं ते करोम्यहम् ॥३९॥ व्यास उवाच इत्युक्ते चेव चांडाले चुकोप ब्राह्मणस्तदा । त ब्राह्मण उवाच ब्राह्मणं मां परित्यज्य किं कार्यमधिकं तव॒ | ॥४०॥ /मूक उवाच कि कुप्यसि वृथाविप्र न बको5हं तवाधुना । कोपस्सिद्धयति ते तावद्दके नान्यत्र किंचन ॥४९॥ गगने स्नानशाटी ते न शुष्यति न तिष्ठति । वचनं खात्ततः श्रुत्वा मद्गृहं चागतो भवान् ॥४२॥ तिष्ठ तिष्ठ वदिष्यामि नोचेद्नच्छ पतिव्रताम् । तां च दृष्ट्वा द्विजश्रेष्ठ दयितं ते फलिष्यति ॥४३॥ व्यास उवाच ततस्तस्य गृहाद्विष्णु द्विजरूपधरो विभुः । विनिस्सृत्य द्विजं प्राह गेहं तस्याः प्रयाम्यहम् ॥४४॥ सविमृश्य द्विजश्रेष्ठस्तेन सार्थ चचाल ह। गच्छतं तमुवाचेदं हरिं विप्रोतिविस्मितः ॥४५॥ विप्र उवाच किमर्थ च त्वया विप्र चांडालस्य गृहोदरे । सदा संस्थीयते तात योषाजनवृते मुदा ॥४६॥ हरिरुवाच इदानीं मानसं शुद्धं भूतं भवतो ध्रुवम् । पतिव्रतादिकं दृष्ट्वा पश्चाज्ज्ञास्यसि मां किल ॥४७॥ विप्र उवाच पतिव्रता च का तात किं वा तस्याश््श्रुतं महत् । येनाहं तत्र गच्छामि कारणं वद मे द्विज॥४८॥ उसे तुम बतलाओ । मूक ने कहा मैं इस समय माता-पिता की सेवा कर रहा हूँ, आपके पास कैसे आऊँ 2॥३७-३८॥ माता-पिता की सेवा करने के बाद में आपका आतिथ्य करूंगा । तब तक आप मेरे दरवाजे पर रहें ॥३९॥ व्सासजी ने कहा-- चाण्डाल के इसतरह कहने पर ब्राह्मण क्रुद्ध हो गये । ब्राह्मण ने कहा-- मुझ ब्राह्मण को छोड़कर तुम्हारा कौन सा बड़ा काम है 2॥४०॥ मूक ने कहा-- ब्राह्मण क्यों क्रोध करते हो ? मैं बक पक्षी नही हूँ । तुम्हारा क्रोध बगले पर ही सफल होगा दूसरे पर नहीं ॥४१॥ अब तुम्हारी घोती आकाश में न तो सुखती है, और न ठहरती है । तुम आकाशवाणी को सुनकर मेरे घर आये हो ॥४२॥ तुम ठहरे रहे तो मैं कहूँगा, नहीं तो तुम पतिब्रता के पास चले जाओ । हे ब्राह्मण ! उसका दर्शन करने से आपका कल्याण होगा ॥४३॥ व्यासजी ने कहा-- उसके घर से ब्राह्मणवेषधारी भगवान् विष्णु निकल कर कहे में उस पतिव्रता के घर जा रहा हुँ ॥४४॥ उसके बाद विचार करके वे ब्राह्मण विप्ररूपधारी श्रीभगवान् के पास चल पड़े । जाते समय उस ब्राह्मण ने श्रीहरि से कहा ॥४५॥ विप्र ने कहा-- हे विप्र स्त्रियों से भरे हुए इस चाण्डाल के घर में आप प्रसन्नता पूर्वक किसलिए रहते हैं ॥४६॥ श्रीहरि ने कहा-- अभी तक आपका मन शुद्ध नहीं हुआ है । आप पतित्रता आदि का दर्शन करके हीमुझे जान पायेंगे ॥४७॥ विप्र ने कहा-- वह पतिव्रता कौन नारी है ? उसका शास्त्रज्ञान कितना है ? उसका कारण मुझे बतलाइये ॥४८॥ श्रीहरि ने कहा- नदियों में गङ्गा श्रेष्ठ है, खयं में पतित्रता श्रेष्ठ है, मनुष्यों में राजा श्रेष्ठ
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