Srishti Khanda Extracted Page 706

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-706

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Sanskrit Original

RR णा C———— णाय Ie ॑ +++-अ- 7 >-- + ८ सृष्टिखण्ड ६८१ भरीर्हिजेंद्र महामोह: प्राविशच्चांत कर्मणि । तत: पापाच्च विप्रस्य चेलं खं च न गच्छति॥२७॥ विषादमगमत्सद्यस्ततः खे तमुवाच ह। देववाण्यु वाच गच्छबाडवचांडालं मूकं परम धार्मिकम् ॥२८॥ तत्र धर्म च जानीषे क्षेमं ते तद्वचो भवेत् । व्यास उवाच खाच्चतद्दचनं श्रुत्वा गतोऽसौ मूकमंदिरम् ॥२९॥ शुश्रूषन्तं च पितरौ सर्वारंभान् ददर्श सः । ददतं शीतकाले च सम्यगुष्णं जलं तयोः ॥३०॥ तैलतापनतांबूलं तथा तूलवतीं पटीम्। नित्याशनं च मिष्टान्नं दुग्धखंडं तथैव च ॥३९॥ दापयंतं वसंते च मधुमालां सुगंधिकाम् । अन्यानि यानि भोग्यानि कृत्यानि विविधानि च॥३ २॥ उष्णो चावीजयत्सोपि नित्यं च पितरावपि । ततस्तयोः प्रचर्या च कृत्वा भुक्तेथ सर्वदा ॥३३॥ श्रमस्य वारणं कुर्यात्संतापस्य तथैव च । एभिः पुण्यैः स्थितो विष्णुस्तस्य गेहोदरे चिरम्॥३४॥ अंतरिक्षे च क्रीडंतमाधारस्तंभवर्जिते । तस्यापि भवने नित्यं स्थितं त्रिभुवनेश्वरम् ॥३५॥ विप्ररूपधरं कांतं नान्यैर्भूतं च सत्परम् । तेजोमयं महासत्वं शोभयंतं च मंदिरम् ॥३६॥ दृष्ट्वा विस्मयमापन्नो विप्रः प्रोवाच मूककम् । विप्र उवाच आसन्नं च ममागच्छ त्वयैवेच्छामि शाश्वतम् ॥३७॥ हितं मे सर्वलोकानां तत्वतो वक्तुमर्हसि । बगला भस्म होकर पृथिवी पर गिर पड़ा ॥२६॥ उसके कारण उस द्विजेन्द्र के भीतर महामोह ने प्रवेश किया उससे उत्पन्न पाप के कारण उस ब्राह्मण का वस्त्र आकाश में नहीं जाने लगा ॥२७॥ उसके कारण उसके मन में विषाद हो गया और उसको आकाशवाणी हुयी । देववाणी ने कहा--- ब्राह्मण तुम परम धार्मिक मूक चाण्डाल के पास जाओ॥२८॥ वहाँ जाकर तुम धर्म को जानोगे उसकी वाणी तुम्हारे लिए कल्याणकारिणी होगी । व्यासजी ने कहा-- आकाशवाणी को सुनकर वह ब्राह्मण उस मूक के घर गया ॥२९॥ उस समय वह अपने माता-पिता की सेवा कर रहा था । ठंढी के दिनों में वह उन सबों को गर्म पानी देता था ॥३०॥ उनके शरीर में तेल लगाता था, तापने के लिए अङ्गीठी देता था, भोजन के पश्चात् पान खिलाता था तथा ओढने के लिए रजाई देता था । उन्हें खाने के लिए प्रतिदिन दुग्ध तथा श्रीखण्ड देता था ॥३१॥ वसन्त ऋतु में वह उन्हे सुगन्धित मधु की माला पिन्हाता था । इसके अतिरिक्त जो भोग सामग्रियाँ होती थीं, उन्हे देता था और उनकी अनेक प्रकार से सेवा करता था ॥३२॥ गर्मी में वह माता-पिता को पंखा झलता था । इसतरह से माता-पिता की सेवा करके वह सदा भोजन करता था ॥३३॥ उनके श्रम तथा संताप को वह मिटाता था । इसी पुण्य के कारण उसके कारण दीर्घ काल से उसके घर में भगवान् विष्णु का निवास था ॥३४॥ वे इसी पुण्य के कारण उसका घर बिना किसी स्तम्भ के आकाश में स्थित था । उसके भवन में नित्य ही त्रैलोक्याधिपति भगवान् विष्णु का निवास था ॥३५॥ वे उसके घर में तेजस्वी वसुगण सम्पन्न ब्राह्मण का रूप धारण करके उस घर की शोभा बढा रहे थे ॥३६॥ यह सब देखकर ब्राह्मण आश्चर्य चकित थे, उन्होंने मूक से कहा ब्राह्मण ने कहा-- तुम मेरे पास आओ, मैं तुमसे सम्पूर्ण संसार के कल्याणकारी बात को जानना चाहता हूँ ।

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