Srishti Khanda Extracted Page 705

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-705

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Sanskrit Original

प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तद्वीपा वसुंधरा। जानुनी च करौ यस्य पित्रोः प्रणमतः शिर:॥१२॥ निपतंति पृथिव्यां च सोऽ क्षयंलभतेदिवम् । तयोश्चरणयोर्यावद्रजश्चिह्वानि मस्तके ॥१३॥ प्रतीके च विलग्रानि तावत्पूतः सुतस्तयोः । पादारविंदसलिलं यःपित्रोः पिबते सुतः ॥१४॥ तस्य पापक्षयं याति जन्मकोटिशतार्जितम् । धन्योऽसौ मानवो लोके पूतोऽसौ सर्वकल्मषात्॥१५॥ विनायकत्वमाप्रोति जन्मनैकेन मानव: । पितरौ लंघयेद्यस्तु वचोभिः पुरुषाधमः ॥१६॥ निरये च वसेत्तावद्यावदाभूत संप्लवम् । पित्रोरनर्चनं कृत्वा भुंक्ते यस्तु सुताधमः ॥१७॥ क्रिमिकूपेऽथ नरके कल्यांतमुपतिष्ठति । रोगिणं चापि वृद्धं च पितरं वृत्तिकर्शितम् ॥१८॥ विकलं नेत्रकर्णाभ्यां त्यक्त्वा गच्छेच्च रौरवम् । अंत्यजातिषु म्लेच्छेषु चांडालेष्वपि जायते ॥१९॥ पित्रोरपोषणं कृत्वा सर्वपुण्यक्षयोभवेत् । नाराध्यपितरौ ु त्रस्तीर्थदेवान्भजन्नपि ॥२०॥ तयोर्नफलमाप्रोति कीटवद्रमते महीम् । कथयामि पुरावृत्तं विप्राः श्ृणुत यत्नतः ॥२१॥ यं श्रुत्वा न पुनर्मोहं प्रयास्यथ पुनर्भुवि । पुरासीच्च द्विजः कञ्चिन्नरोत्तम इति स्मृतः ॥२२॥ स्वपितरावनादृत्य गतोऽसौ तीर्थसेवया। ततः सर्वाणि तीर्थानि गच्छतो ब्राह्मणस्य च ॥२३॥ आकाशेस्नानचेलानि प्रशुष्यंति दिने दिने । अहंकारोऽविशत्तस्य मानसे ब्राह्मणस्य च ॥२४॥ मत्समोनास्ति वै कश्चित्पुण्यकर्मा महायशाः । इत्युक्ते चानने तस्य 57दच्च बकस्तदा ॥२५॥ क्रोधाच्चैवेरितस्तस्य स शशाप द्विजो बकम् । पपात च बकः पृथ्व्यां सभस्मीभूतविग्रहः ॥२६॥ माता और पिता की प्रतिदिन प्रदक्षिणा करनी चाहिए ॥११॥ जो ऐसा करता है उसको सम्पूर्ण पृथिवी की प्रदक्षिणा करने का फल प्राप्त होता है । जो पृथिवी पर घुटना टेककर माता-पिता को शिर झुकाकर प्रणाम करता है ऐसा करने वाला व्यक्ति अक्षय स्वर्ग को प्राप्त करता है । माता-पिता के चरणों की धूलि जब तक मस्तक में लगी रहती है। १२-१३॥ तब तक वह पुत्र शुद्ध रहता है । जो माता-पिता के चरणोदक को प्रतिदिन पीता है ।॥।१४॥ उसके करोड़ों जन्मों में अर्जित पाप विनष्ट हो जाते हैं । वह मनुष्य संसार में धन्य हो जाता है, तथा सभी पापों से पवित्र हो जाता है ॥१५॥ वह मनुष्य एक ही जन्म में विनायक का पद प्राप्त कर लेता है । जो अधम पुरुष माता-पिता की आज्ञा का पालन नहीं करता है ॥१६॥ वह प्रलय काल पर्यन्त नरक में निवास करता है । जो अधम पुत्र माता-पिता की पूजा किये बिना खा लेता है ॥१७॥ वह क्रिमिकूप नामक नरक में कल्प के अन्त पर्यन्त निवास करता है । रोगी, तथा वृत्तिविहीन माता-पिता को ॥१८॥ तथा अन्धे और बहरे माता-पिता को छोड़कर मनुष्य रौरव नामक नरक में जाता है और उसका जन्म शूद्र जातियों में, म्लच्छों में तथा चाण्डाल जाति में होता है ॥१९॥ माता-पिता का पोषण नहीं करने पर सभी पुण्यों का नाश हो जाता है । माता-पिता की सेवा न करके तीर्थ और देवताओं की आराधना करके भी मनुष्य ॥२०॥ उन सबों का फल नहीं प्राप्त करता है, वह पृथिवी पर कीड़ों की तरह भ्रमण मात्र करता है । हे ब्राह्मणों ! इस विषय में मैं एक पुराना इतिहास बतलाता हूँ, उसे तुमलोग सुनो । उसको सुनकर आपलोगों को संसार में फिर मोह नहीं होगा । प्राचीन काल में एक नरोत्तम नामक ब्राह्मण था ॥२१-२२॥ वह अपने माता-पिता का अनादर करके तीर्थाटन में चला गया । उसके बाद सभी तीर्थो में जाने वाले उस ब्राह्मण के ॥२३॥ स्नान किए हुए वस्र प्रतिदिन आकाश में सुखते थे । उस ब्राह्मण के मन में अहङ्कार ने प्रवेश किया ॥२४॥ वह सोचता था कि मेरे समान कोई पुण्य करने वाला महायशस्वी नहीं है । इसतरह से कहते समय ही एक बगले ने उसके मुख पर विट् कर दिया ॥२५॥ इससे ब्राह्मण को क्रोध आ गया और उसने बगले को शाप दे दिया । उसके कारण वह

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