Srishti Khanda Extracted Page 704

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-704

padma-puranasrishti-khandacreation-cosmologypartialpage-extract

Sanskrit Original

पचासवाँ अध्याय भीष्म उवाच यत्पुण्यमधिकं लोके सर्वदा सर्वसंमतम्। तद्ददस्वेच्छया विप्र यत्कृतं पूर्वपूर्वकैः॥९॥ पुलस्त्य उवाच एकदा तु द्विजाः सर्वे व्यासशिष्य स्सहादरात्। व्यासं प्रणम्यपप्रच्छुधर्म मां च यथाभवान् ॥२॥ द्विजा ऊचुः पुण्यात्पुण्यतमं लोके सर्वधर्मेषु चोत्तमम् । किं कृत्वा मानवा स्वर्गं भुंजते चाक्षयं वद ॥३॥ लभ्यं चाकष्टकं शुद्धं वर्णानां मर्त्यवासिनम्। गुरुणां च लघूनां च साध्यमेकक्रतुं वद ॥४॥ यद्यत्कृत्वा च देवानां पूज्यो नाके भवेन्नरः । तत्तद्दद च नो ब्रह्मन् प्रासादी भव धर्मतः ॥५॥ व्यास उवाच पंचाख्यानं वदष्यामि शृणुध्वं तत्र पूर्वतः । पंचानामेककं कृत्वा विदेन्मोक्षं दिवं यशः ॥६॥ पित्रोरर्चाऽ थपत्युश्च॒ साम्यं सर्वजनेषु च । मित्राद्रोहो विष्णुभक्तिरेते पंचमहामखाः ॥७॥ प्राकपित्रोरर्चया विप्रा यदधर्म साधयेन्नरः । न तत्क्रतुशतैरेव तीर्थयात्रादिभिर्भुवि ॥८॥ पिताधर्मः पितास्वर्गः पिता हि परमंतपः। पितरिप्रीतिमापन्ने प्रीयंते सर्वदेवताः ॥९॥ पितरोयस्यतृप्यंति सेवया च गुणेन च। तस्य भागीरथीस्नानमहन्यहनि वर्तते ॥१०॥ सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमयः पिता। मातरं पितरं चैव यस्तुकुर्यात्रदक्षिणम्॥९९॥ पितृसेवा की प्रशंसा, मूकाख्यान, पिता के अनदर से होने वाले पापों का वर्णन, पतिव्रता का लक्षण, मित्र से द्रोह न करने की प्रशंसा, पुत्र के कर्तव्य का निरूपण, पिता की पूजा करने का माहात्म्य, चूडामणि योग का वर्णन, श्राद्ध की प्रशंसा और श्राद्ध करने में असमर्थ के कर्तव्य का वर्णन भीष्मजी ने कहा-- हे ब्रह्मन् ! जो सबसे अधिक पुण्यप्रद हो, सदा सबके अनुकूल हो, हे विप्र ! उसको अपनी इच्छानुसार कहें, जिसको पूर्वपुरुषों ने किया हो ? पुलस्त्य महर्षि ने कहा--- एकबार सभी ब्राह्मण जो व्यासजी के शिष्य थे, उन सबों ने आदर पूर्वक व्यासजी को प्रणाम करके उनसे इसी प्रकार से धर्म के विषय में पूछे जैसे आपने मुझसे पूछा है ॥२॥ ब्राह्मण ने कहा-- लोक में सर्वाधिक पुण्यमय कौन सा कर्म करके सभी मनुष्य अक्षय स्वर्ग का भोग करते हैं 2॥३॥ जो शुद्ध धर्म विना कष्ट के ही सभी लोगों के लिए सुलभ हो आप उस यज्ञ को बतलाइये ॥४॥ जिन कर्मो को करके मनुष्य देवताओं का पूज्य हो जाता है, हे ब्रह्मन् ! आप कृपा करके उसे हमलोगों को बतलाइये ॥५॥ व्यासजी ने कहा-- मैं पाँच आख्यानों को बतलाऊंगा उनमें से किसी एक का भी अनुष्ठान करके मनुष्य, स्वर्ग, मोक्ष और यश को प्राप्त कर लेता है ॥६॥ माता-पिता की सेवा, पति की सेवा, सभी जीवों के प्रति समता की भावना, मित्र से द्रोह न करना तथा भगवान् विष्णु की भक्ति ये पाञ्चो महायज्ञ हैं ॥७॥ सर्वप्रथम माता-पिता की सेवा करके हे विप्रों ! मनुष्य जिस धर्म को प्राप्त कर लेता है उसकी प्राप्ति सैकड़ो यज्ञं तीर्थयात्रओं से नहीं हो सकती है ।॥८॥ पिता ही धर्म, स्वर्ग और सर्वश्रेष्ठ तप हैं, पिता के प्रसन्न हो जाने पर सभी देवता प्रसन्न हो जाते हैं । जिसकी सेवा तथा गुण के द्वारा माता-पिता प्रसन्न हो जाते हैं, उसको प्रतिदिन गङ्गा स्नान करने का फल प्राप्त होता है ॥९-१०॥ माता सभी तीर्थ स्वरूप होती है और पिता सर्व देवमय होते हैं, अतएव

No translation available yet.

Spotted a mistake or have a question? Sign in to let us know