Srishti Khanda Extracted Page 701

Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-701

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Sanskrit Original

यज्ञवृक्षस्य मूले च उद्याने पुष्पवाठके । शरीरस्य मलत्यागं न कुर्याज्जीवने तथा ॥९४॥ विप्रस्यायतने गोष्ठे रम्ये राजपथेषु च। न क्षौरं कारयेद्धीरः कुजस्याह्नि कदाचन ॥९५॥ मलं न धारयेहंते नखं न वदने क्षिपेत्। तैलाभ्यंगं न कुवीत वासरे रविभौमयोः ॥९६॥ स्वगात्रासनयोर्वाद्य गुरोरेकासनादनम्। न हरेच्छोत्रियस्वं च देवस्यापि गुरोरपि॥९७॥ राज्ञस्तपस्विनां चैव पंगोरंधस्य योपितः। पंथा देयोब्राह्मणाय गोभ्यो राजभ्य एव च॥९८॥ रोगिणे भारतप्ताय गुर्विण्यै दुर्बलाय च । विवादं न च कुर्वीत नृपविप्रचिकित्सकैः ॥९९॥ ब्राह्मणं गुरुपत्नीं च दूरतःपरिवर्जयेत् । पतितं कुष्ठसंयुक्तं चांडालं च गवाशिनम् ॥१००॥ निर्धूतं ज्ञानहीनं च दूरतःपरिवर्जयेत्। स्त्रियं दुष्टां च दुर्वृत्तामपवादप्रदायिनीम् ॥१० १॥ कुकर्मकारिणीं दुष्टां सदैव कलहप्रियाम्। प्रमत्तामधिकांगीञ्च निर्लज्जां ब्रह्मचारिणीम्॥९०२॥ व्ययशीलामनाचारां दूरतःपरिवर्जयेत् । मलिनां नाभिवंदेत गुरुपत्नीं कदाचन॥९१०३॥ न स्पृशेत्तां च मेधावीस्पृष्ट्वास्नानेन शुद्ध्यति । स तया सह केलिं च वर्जयेच्च सदैव हि ॥१०४॥ शृणुयाच्च वचो नूनं नपश्येच्च गुरोःस्त्रियम् । वधूं पुत्रस्य भ्रातुश्च स्वपुत्रीं युवतीं ध्रुवम् ॥१०५॥ अन्यां च गुरुपत्नीं च नेक्षेत्स्पर्श न कारयेत् । ताभिःसह कथालापं तथाभ्रूभंगदर्शनम् ॥१०६॥ कलहं निस्त्रपां वाणीं सदैवपरिवर्जयेत्। नदद्याच्च सदापादं तुषांगारास्थिभस्मसु ॥९०७॥ कार्पासास्थिषु निर्माल्ये चितिकाष्ठे चितौ गुरौ । शुष्कं मीनं न भक्षेत पूतिगंधिममेध्यकम्॥९०८॥ विघसं चान्यदुच्छिष्टं पाकार्थं च परस्य च । न स्थातव्यं न गंतव्यं क्षणमप्यसता सह ॥१०९॥ में कभी अपने शरीर के मल का त्याग नहीं करना चाहिए ।॥९२-९४॥ ज्ञानी व्यक्ति कभी भी ब्राह्मण के घर में, गोशाला में, मनोहर राजमार्ग पर तथा भौमवार को क्षौर न कराये ॥९५॥ दाँत को गन्दा न रखे, नख को मुंह में नही डाले, रविवार एवं भौमवार को शरीर में कभी तेल न लगाये ॥९६।। अपने शरीर और आसन पर ताल न दे, गुरु के आसन पर न बैठे, श्रोत्रिय ब्राह्मण, देवता और बालक की सम्पत्ति के न हड़पे ॥९७॥ राजा, तपस्वी, पंगु, अंधा और स्त्री इन सबों को रास्ता दे देना चाहिए । ब्राह्मण, गौ और राजाओं को भी मार्ग दे दे ॥९८॥ रोगी, भारवाहक, गर्भिणी और दुर्बल को भी रास्ता दे दे । राजा, ब्राह्मण और चिकित्सक से विवाद न करे ॥९९॥ ब्राह्मण और गुरु की पत्नी से दूर रहे । पतित, कोढ़ी, चाण्डाल, गोमांस भक्षी, धूर्त, और अज्ञानी का दूर से ही परित्याग कर दे । दुष्टा, दुराचारिणी, निन्दा करने वाली स्त्री ॥१००-१०१॥ कुकर्म कराने वाली, दुष्टा, सदा कलह करने वाली, प्रमत्ता, अधिकाङ्गी, निर्लज्जा, बाहर घूमने वाली, अपव्य करने वाली और अनाचारिणी, स्री का भी दूर से ही परित्याग कर दे । मलिन (रजस्वला) गुरु पत्नी को कभी प्रणाम न करे ॥१०२-१०३॥ मेधावी उसका कभी स्पर्श न करे, स्पर्श हो जाने पर स्नान करे । ऐसी स्री के साथ हँसी मजाक कभी न करे ॥१०४॥ गुरु की पत्मो की बातों को सुन ले किन्तु गुरु की पत्नी को कभी देखे नहीं । पुत्रवधू, भाई की पत्नी, अपनी युवती पुत्री ॥१०५॥ दूसरी युवतियों को तथा गुरुपत्नी को न तो देखे और न स्पर्श करे । उन सबों के साथ हँसी मजाक तथा इशारा इत्यादि न करे ॥ १०६॥ कलह और निर्लज्जता की बातों का सदा वर्जन करे । धान की भुस्सी, अंगार, हड्डी तथा भस्म पर कभी पैर न रखे ॥१०७॥। कपास, हड्डी, देवताओं पर चढी हुयी वस्तुओं, चिता की लकड़ी, चिता तथा गुरु पर कभी पैर न रखे । सूखी मछली को न खाये, वासी, जिससे गंध आ रही हो तथा अमेध्य वस्तुओं को न खाये।।१०८॥ अपवित्र, दूसरे का जूठा तथा रसोई बनाने के लिए रखी हुयी दूसरे की वस्तु को न खाय । दुष्टं के

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