Srishti Khanda Extracted Page 700
Padma Purana Sanskrit Hindi Part 1 (Chaukhamba Surbharati; extracted partial page blocks) · part-1 · Verse page-700
Sanskrit Original
प्रक्षालयेत्तत:पीठं काष्ठं पात्रं शिलातलम् । भस्मना कांस्यपात्रं तु ताम्रमम्लेन शुध्यति॥७९॥ शिलापात्रं तु तैलेन फालं गो वालकेन तु । स्वर्णरौप्यादिपात्रं तु जलमात्रेण शुध्यति ॥८०॥ अग्निना लोहपात्रं तु पाकप्रक्षालनेन तु । खननाद्दाहनाच्चैव उपलेपनधावनात् ॥८ १॥ पर्जन्यवर्षणाच्चैव भूरमेध्या विशुध्यति । तैजस्सानां मणीनां च सर्वस्याश्ममयस्य च ॥८२॥ भस्मभिर्भृत्तिकाभिश्च शुद्धिरुक्ता मया पुरा। शय्या भार्या शिशुर्वस्रमुपवीतं कमंडलु: ॥८ ३॥ आत्मनः कथिताश्शुद्धा न परेषां कदाचन । नभुंजीतैक वस्त्रेण नस्नायादेकवाससा ॥८४॥ नधारयेत्परस्यैवं स्नानवस्त्रं कदाचन। संस्कारं केशदंतानां प्रातरेव समाचरेत् ॥८५॥ गुरूणांच नमस्कारं नित्यमेव समाचरेत्। हस्तपादे मुखे चैव पंचाद्रों भोजनं चरेत्॥८६॥ पंचार्द्रंकस्तु भुंजानः शतं वर्षाणि जीवति । देवतानां गुरोराज्ञां स्नातकाचार्ययोरपि ॥८७॥ नाक्रमेत्कामतश्छायां विप्रस्य दीक्षितस्य च । गोगणं दैवतं विप्रं घृतं मधु चतुष्पथम्॥८८॥ प्रदक्षिणं प्रकुर्वीत प्रख्यातांश्च वनस्पतीन् । गोविप्रावप्निविप्रौ च विप्रौद्वौ दंपती तथा ॥८९॥ तयोर्मध्ये न गच्छेत स्वर्गस्थोपि पतेद् ध्रुवम् । उच्छिष्टो नस्पृशेदग्निं ब्राह्मणं दैवतं गुरुम् ॥९०॥ स्वशीर्ष पुष्पवृक्षं च यज्ञवृक्षमधार्मिकम्। त्रीणि तेजांसि नोच्छिष्ट उदीक्षेत कदाचन ॥९१॥ सूर्याचंद्रमसावेव नक्षत्राणि च सर्वशः । नेक्षेद्विप्रं गुरुं देवं राजानं यतिनां वरम् ॥९२॥ योगिनं देवकर्माणं धर्माणां कथकं द्विजम् । नदीनां च प्रतीरेच पत्युश्च सरितां तथा ॥९३॥ सुनो । प्रतिदिन गोबर से घर को पोतना चाहिए ॥७८॥ उसके बाद काठ की चौकी को धोए, पात्रों को तथा शिला हो तो उसको भी धोए । कांसे के पात्र की भस्म से और ताम्बे के पात्र की खटाई से शुद्धि होती है । पत्थर का पात्र तेल से शुद्ध होता है, फाल की शुद्धि गोबाल से होती है । सोने और चाँदी के पात्र की शुद्धि केवल जल से होती है ॥७९-८०॥ लोहे के पात्र की शुद्धि आग से होती है, पाक की शुद्धि धोने से होती है । खनन करने से तथा जलाने से भी होती है उपलेपन उबटन आदि की शुद्धि धो लेने से होती है ॥८ १॥ अपवित्र भूमि की शुद्धि वर्षा से होती है । मणि आदि तैजस पदार्थों तथा समस्त पत्थर के पदार्थो की शुद्धि भस्म तथा मिट्टी से होती है; इस बात को मैं पहले कह चुका हूँ । शय्या, पत्नी, बच्चा, वस्र, यज्ञोपवीत तथा कमण्डलु ॥८२-८३॥ ये सभी अपने ही शुद्ध होते हैं दूसरे के नहीं । एक वस्र पहन कर भोजन न करे और न तो एक वस्र पहन कर स्नान करे ॥८४॥ दूसरे के स्नान के वस्न को नहीं धारण करना चाहिए । केश और दाँतों की सफाई प्रातःकाल ही करनी चाहिए।।८५॥ गुरुजनों को प्रतिदिन प्रणाम करना चाहिए । दोनो हाथ दोनो पैर तथा मुख धोकर ही भोजन करना चाहिए ॥८६॥ इन पाँचों को भिंगोकर भोजन करने वाला सौ वर्ष तक जीवित रहता है । देवताओं की तथा गुरु की आज्ञा का तथा स्नातक तथा आचार्य की छाया को जानकर न लाँषे । यज्ञ में दीक्षित ब्राह्मण की भी छाया को न लाँघे । गो समूह,देवता, ब्राह्मण, घी, मधु (शहद) तथा चौरास्ता ॥८७-८८॥ इनको दाहिने करके चलना चाहिए प्रख्यात वनस्पतियों को भी गौ, दो ब्राह्मण, अग्नि और विप्र, दो दम्पती, इन सबों के बीच में नहीं जाना चाहिए । इन सबों के वीच में जाने वाले स्वर्गीय व्यक्ति का भी पतन हो जाता है । जूठे मुँह अग्नि, ब्राह्मण, देवता और गुरु का स्पर्श न करे॥८९-९ ०॥ जूठे मुँह अपने शिर के पुष्प, यज्ञीयवृक्ष तथा अधार्मिक इन तीनों तेजों को न देखे ॥९ १॥ सूर्य, चन्द्रमा, तारे, ब्राह्मण, गौ, देवता, राजा, संन्यासी, योगी, देवता का कार्य करने वाले को तथा धर्मोपदेश करने वालों को जूठे मुँह न देखे । नदी तथा समुद्र के तट में, यज्ञीय वृक्ष की जड़ में, उद्यान में, पुष्प वाटिका में, जीवन
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